वक्ता: मन जब भी विचार करता है कि धन्यवाद देना है, प्रेम उठता है। तो मन को उसको एक नाम देना ही पड़ेगा। यह तो कहा ही गया है कि तुम ही हो माता, पिता तुम ही हो और यह भी कहा गया है ‘पिया’। जो मन पिया शब्द का प्रयोग कर रहा है वह ऐसा मन है जिसको अपने रोज़ के काम धंधों की व्यर्थता समझ में आ गयी है, जो एक प्रकार की बेचैनी में जी रहा है, एक अधूरेपन का एहसास है उसको, कुछ कमी है, कुछ खटक रहा है, दुनिया रूखी लगती है दुनिया से जो भी मिला है वो अपूर्ण लगता है। पहले जिसको प्रेम समझता था वो भ्रम है, आसक्ति है यह उसको दिख गया है। जो झूठा है, जो प्रेम नहीं है वह दिख गया है, जो सच्चा है उसकी तलाश है और जो वास्तविक प्रेम है उसकी प्यास है। तब जो रूप है जिसको मन प्रयोग करता है वो है पति का, प्यारे का, पिया का। यह प्रेम का भूखा मन है। जो मन बोध का भूखा होगा वह प्रेम नहीं कहेगा, पिया नहीं कहेगा, वह कहेगा, ‘अँधेरा दूर होगा’, वो कहेगा, ‘सत्य के दर्शन हो जाएंगे’ और यह एक दूसरे प्रकार का मन है । यह मन हम सबके भीतर होता है। शास्त्रीय तौर पर इसको स्त्री का मन माना गया है, पर स्त्री हम सबके भीतर है। कबीर ने कहा है कि जब तक शरीर दो हैं तब तक प्रेम हो कैसे सकता है और यह बहुत भूखा मन है। यह छोटे मोटे प्रेम से राज़ी ही नहीं होता, इसे पूरा चाहिए। यह कहता ही नहीं है की दो चार टुकड़े दाल दो और मैं मान जाऊंगा, यह कहता है पूरा चाहिए, इसीलिए यह जो सांसारिक रिश्ते है इनसे इसका पेट भरता नहीं, इसे पूरा चाहिए। संसार में भी पिया होते हैं, प्रियजन होते हैं, पति होते हैं, यह उनको यह मानता नहीं है।
“कबीरा रेख सिंदूर की काजल किया न जाए, तन में मन में पिया बसे दूजा कौन समाए”
यह जो प्रीतम है जिसके लिए सिंदूर डालती हूँ और जिसके लिए काजल लगाती हूँ यह छोटा है, यह तुच्छ है। इसके लिए कहाँ जगह बचेगी? दिख गया कि यह उस परम के समक्ष कुछ भी नहीं है। यह मुझे क्या देगा यह खुद भिखारी है। आपको इसमें जाना चाहिए कि संतो ने उसे, परम को, अक्सर पति के रूप में देखा है। पिता रूप में कम देखा गया है, पति रूप में ज़्यादा देखा गया है। क्यों? आपको पूछना होगा। यह प्रेम का भूखा मन है और प्रेम का मतलब होता है एक हो जाना, यह डूब जाना चाहता है। य़ह परम को पति के रूप में देखता है ।
प्रेम की तलाश हम सबको है। कोई नहीं होगा ऐसा जो यह कह सके की छक कर के पी लिया। कोई नहीं कहेगा की जितना चाहिए था उतना मिल गया प्रेम, अब चाहिए ही नहीं। दुनिया और दुनिया के लोग हमें जितना भी प्रेम दें, वह कम ही पड़ता है और जो मिला भी होता है, मैं यह गहराई से जानता है कि वो शर्तों पर मिला है। वो शर्तें आज पूरी होनी बंद हो जाएं तो प्रेम की धारा बंद हो जाएगी, तो वह प्रेम कोई वास्तविक प्रेम है ही नहीं। बेशर्त, अखंड, वृहद प्रेम की प्यास सबके मन में है। कोई कितना दावा कर ले कि मुझे जितना मिलना था मिल गया, नहीं मिला नहीं है। मिला नहीं है और इसका आपको एहसास भी है कि मिला नहीं है इसीलिए जीवन बड़ा बेचैन रहता है। यह जो मन है यह जान जाता है की मिला तो नहीं है और जगत से मिलने की संभावना भी नहीं है। जगत के स्रोत तक जाना पड़ेगा, उस परम तक जाना पड़ेगा तब यह मिल सकता है। तब यह अपनी सारी प्रेम की प्यास उस परम की ओर मोड़ देता है। कहता है, ‘इधर-उधर का क्या अपनाना तुम ही मेरे हो जाओ। दो चार रुपया क्या माँगना तुम जो सबसे बड़े धनी हो तुम ही मेरे हो जाओ।



