गलत जगह ढूंढ रहे सुख को || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)

श्रोता: आचार्य जी, आपने जैसे कहा कि, जो भी काम करो उसमें डूब कर पूरी तरह से करो, तो क्या यह सम्भव है क़ि हम एक काम करते रहें और दूसरा विचार-सोच हमारे दिमाग मे ना आये।
आचार्य प्रशांत: नहीं, संभव तो है ही है, संभव क्यों नहीं है।
श्रोता: आचार्य जी, ऐसा होता नहीं है कि ये काम कर रहे हैं कुछ देर किया फिर दूसरी चीज़ या बातें दिमाग़ मे आती हैं, फिर ये बात आती रहती है, फिर वो बात आती है।
आचार्य जी: उसकी वजह है। बैठो, क्या नाम है?
श्रोता: सदाकत हुसैन।
आचार्य जी: उसकी वजह है सदाकत, तुम जो कुछ भी करते हो, तुम उसको नहीं करते हो तुम्हें उसके माध्यम से कुछ चाहिए होता है। तुम जो भी कुछ कर रहे होते हो तुम वास्तव में वो नहीं कर रहे होते हो। तुम उसको सिर्फ इसलिए कर रहे होते हो, क्योंकि निशाना कहीं और होता है। तुम यहाँ पढ़ने आये हो क्या वास्तव में तुम यहाँ पढ़ने आये हो, या निशाना है डिग्री पर, या निशाना है नौकरी पर? तुम यहाँ पढ़ने आये हो ईमानदारी से बताओ, कितने लोग पढ़ोगे यदि बता दिया जाए की डिग्री नहीं मिलती है।
श्रोता: कोई नहीं पढ़ेगा।


