प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एकाग्रता क्यों नहीं बनती?
आचार्य प्रशांत: कितने लोग यहाँ बैठे हो जो एकाग्र होना चाहते हो, पर पाते हो कि हो नहीं पाते? जिन मौकों पर एकाग्रता की ख़ासतौर पर ज़रूरत पड़ती है, उन्हीं मौक़ों पर वो आती नहीं, ऐसा कितने लोगों के साथ होता है?
(कुछ श्रोतागण हाथ उठाते हैं)
ठीक। मेरे लिए बड़ा आसान है कि मैं तुमको छोटी-सी दवाई थमा दूँ कि ऐसे कर लो तो हो जाएगा। और बाज़ार में ऐसी दवाईंयाँ बहुत हैं; ‘कैसे पाएँ एकाग्रता को?’, बहुत घूम रहा है ये सब कुछ।
मैं ज़रा कहीं और से शुरू करता हूँ। मैं तुमसे पूछ रहा हूँ कि तुम कभी भी, किस वस्तु पर एकाग्र हो पाओगे?
मन है न जो एकाग्र होता है? एकाग्र होने का अर्थ है कि मन कहीं पर जा कर के बैठ गया है, और वहाँ से हिल नहीं रहा है। यही है न एकाग्रता?
मन किस पर एकाग्र होना चाहेगा?
प्र: जो उसको अच्छा लगेगा।

