आचार्य प्रशांत: हर तादात्म्य का सम्पूर्ण अस्वीकार, सिर्फ शरीर से तादात्म्य का नहीं, ये है ‘नाहं’। ये ध्यान का फल है। ध्यान जितना गहरा होगा, ‘नाहं’ उतनी जल्दी आएगा। ध्यान, आपके तीक्ष्ण अवलोकन का फल है। जितनी तीक्ष्णता से आप अवलोकन कर पाओगे उतनी जल्दी आप ‘नाहं’ कह पाओगे। इसको रमण ऐसे कहा करते थे कि ‘नाहं’ से पहले आता है ‘देहं’। देहं, नाहं, कोऽहं, सोऽहं। जो अवलोकन नहीं करता उसके लिए वो सिर्फ क्या है?
प्रश्नकर्ता: ‘देहं’।
आचार्य: ‘कोऽहं’ क्या है? ये कोई क्यों पूछेगा, ‘मैं कौन हूँ?’
जब व्यक्ति व्यथित होता है, तभी ये सवाल उठता है। एक तरीके से ये अशांति से उपजा सवाल है। ‘कोऽहं’ जो है वो अशांति से निकला सवाल है। पुरानी मान्यताएँ, धारणाएँ जब टूटती हैं, तब सवाल उठता है, ‘कोऽहं’। यह वो तो नहीं जो सोचा था आज तक, तो फिर मामला क्या है, चक्कर क्या है? जो कुछ मान कर बैठा था, वो तो नहीं है। तो फिर सच्चाई क्या है?
प्र२: ‘कोऽहं’ कौन पूछता है?
आचार्य: अहंकार ही पूछता है। जानना, पूछना, सवाल कैसा भी हो, अहंकार का ही है। दिशा बदल रही है। यूँ समझ लो एक आदमी एक तरफ बड़ी तेज़ी से गाड़ी चलाए जा रहा है, तो ‘कोऽहं’ एक यू-टर्न है। उसकी दिशा क्या है? अभी तक गाड़ी किधर को जा रही है?



