आचार्य जी: अच्छा, यह सब जो दिख रहा है, इसमें एक अपनी व्यवस्था है, या नहीं है? तुमनें कहा कि नदी दिख रही है, पेड़ दिख रहा है, सूरज है, पक्षी हैं, हवा चल रही है। यहाँ मछलियाँ हैं नदी में, बाहर और जानवर हैं, ये कुत्ता खड़ा है। कुछ इसमें से ऐसा है, जो लग रहा है कि स्थिर है, चल नहीं रहा है। और कुछ ऐसा है जो साफ़-साफ़ चलता हुआ भी दिख रहा है; नदी का बहाव है, हवा का बहाव है। पेड़ लगता है कि चल नहीं रहा है पर गति उसमें भी है। तो यह सब जितना है, इसमें इसकी अपनी कोई आंतरिक व्यवस्था, एक इंटरनल आर्डर है या नहीं है?
इंजीनियरिंग की तरह से ही सोचो अगर, तो यह सब व्यवस्थित है या नहीं है? इसमें व्यवस्था है? इसमें एक आर्डर्लिनेस है; व्यवस्था। तो, नदी अपना तट तोड़कर चढ़ी नहीं आ रही। चढ़ती भी है तो उस चढ़ने में भी एक व्यवस्था होती है। जमीन में पानी है और ठीक इतना है कि उससे पेड़ हैं। कम हो जाएगा तो भी पेड़ नहीं रहेंगे, ज्यादा हो जाएगा तो भी पेड़ नहीं रहेंगे। हवा का बहाव है और ऐसा भी नहीं है कि शून्य हो, पर ऐसा भी नहीं है कि सब उखाड़ ही दे।
किसी भी चीज की, किसी दूसरी चीज से दुश्मनी जैसी नहीं लग रही है। और, व्यवस्था गहरी है। गहरी से अर्थ यह है कि गहराई में इसके सारे तत्व, वो सारे एलीमेंट्स, वस्तु, जो तुमनें लिखे हैं। इसकी सारी अलग-अलग लगने वाली इकाईयाँ, एक-दूसरे से जुड़े हुआ हैं। और, सब मस्त हैं। कोई ऐसा नहीं कि किसी को दिक्कत हो इसमें। और, ऐसा भी नहीं है कि किसी को समझौता करना पड़ रहा है, कंधे पर पत्थर रखना पड़ रहा है। जिसको जितना चाहिये, ठीक उतना उपलब्ध भी है। मछली को पानी की कमी नहीं है, पक्षी को आकाश की कमी नहीं है, पेड़ को धरती की कमी नहीं है।
तो यह एक व्यवस्था चल रही है, और यह व्यवस्था ऐसी है जिसमें कोई केन्द्रीयकरण नहीं है, कोई सेंट्रल अथॉरिटी कहीं नहीं बैठी हुई है। व्यवस्था अपने आप को ही सुचारू रूप से चला रही है। व्यवस्था ऐसी है, जिसमें उसके तत्व और उन तत्वों की जो पारस्परिक व्यवस्था है, वो अलग-अलग है ही नहीं। नदी का होना ही पेड़ के लिए अच्छा है। नदी को कुछ अलग से नहीं करना पड़ रहा है। नदी का होना ही काफी है।


