आचार्य प्रशांत: पुण्य, आचरण की बात नहीं है। ‘पुण्य’ किसी विशिष्ट आचरण की बात नहीं है और ना ही अच्छाई किसी निर्धारित प्रकार से आचरण करने की बात है और ना ही पुण्य बात है एक ख़ास विषय के बारे में विचार करने या ना करने से। पर भरा तो यही गया है, आप सबके दिमाग में। हमें बताया गया है कि, ‘’ऐसा बर्ताव मत करो, ऐसा मत सोचो’’ और हमें लगता है यही सही है, यही नैतिक है और हमारे सारी अच्छाई का भाव भी यहीं से आता है। तो इसे मूलतया हम कहते हैं कि यह ही आचरण है।
उससे थोड़ा अंदर जाते हैं, तो हम कहतें हैं, ‘विचार’, उसके नीचे भी कुछ है, उसकी बात यहाँ कोई नहीं करता। यहाँ पर कोई ऐसा नहीं है, जो आचरण एक हद से ज़्यादा गिरा हुआ दिखा सके क्योंकि कॉलेज से निकाल दिए जाओगे, और उससे भी ज़्यादा गड़बड़ व्यवहार दिखाया, तो जेल में पहुँच जाओगे। तो व्यवहार के तल पर तो हम सब बड़े पुण्यात्मा होते हैं, बड़ी अच्छाई दिखाते हैं। ये बात समझ में आ रही है?
व्यवहार के तल पर देखो तो ऐसा लगेगा सब ठीक ही तो है। हम सोचतें है पुण्य यहाँ है कि हमने व्यवहार ठीक दिखा दिया। नहीं, व्यवहार में पुण्य नहीं आता, तो इसको मैं स्ट्राइक-आउट (काटना) करता हूँ। जो लोग थोड़े ज़्यादा समझदार हैं, जिन्होंने थोड़ा और गहराई में जाना चाहा है, उन्होंने सोचा है पुण्य इस बात में है कि विचारों पर नियंत्रण, मन नियंत्रित करने से होगा। ये सब शब्द सुनें हैं? आज-कल टी.वी बहुत फैशनेबल हो गए हैं, कि विचारों को कैसे नियंत्रित करें और आते हैं सब बाबा लोग और बताते हैं कि, ”देखो बच्चा, ऐसा मत सोचना, वैसा मत सोचना”, और करीब-करीब ये ही सवाल चेतन (प्रश्नकर्ता) का भी है कि, "मेरे मन में एक प्रकार के विचार आते हैं।" ठीक है? और हम सोचते हैं, ज़्यादातर लोग तो यही पर हैं, कि ये उनके पास गड़बड़ है, इसको ठीक करके सोचते हैं कि, "हम बढ़िया आदमी हैं!" दिमाग में पूरी तरह से भ्रष्टाचार चल रहा होता है, व्यवहार ठीक कर लेते हैं और सोचते हैं, कि किसी को पता थोड़े ही चल रहा है। वो मेरे सामने से गुज़र गई और मन-ही-मन मैंने क्या कर लिया उसको पता थोड़ी चला!
ठीक है? व्यवहार तो सामान्य ही रखा न? व्यवहार सामान्य ही नहीं रखा, बोल और दिया, “हाई, गुडमॉर्निंग"।अब उस बेचारी को पता भी नहीं है कि उस

