वासना निर्बल और निराधार क्यों? || आचार्य प्रशांत, रवीन्द्रनाथ टैगोर पर (2018)

तुम मुझे रोज़मर्रा की निर्बल और निराधार वासना से बचते रहने की शक्ति देते रहो।
~ गीतांजलि
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, वासना को निर्बल और निराधार क्यों कह रहे हैं?
आचार्य प्रशांत: वासना को रवीन्द्रनाथ निर्बल इसीलिए कह रहे हैं, क्योंकि वासना में बल होता तो वासना उसको पा ही लेती न जिसके लिए वो उठती है।
हर इच्छा, हर कामना, हर वासना चाहती क्या है?
शान्ति।
पर वासना को कभी शान्ति मिलती है? मिली? तो इसीलिए उसे रवीन्द्रनाथ कह रहे हैं, “निर्बल।”
और क्यों कह रहे हैं, “निराधार?” क्योंकि जिसका आधार होता है, आधार माने बुनियाद, जिसका आधार होता है वो अडिग रहता है, वासना को कभी अडिग रहते देखा है? इच्छा कभी अडिग रहते देखी है? क्या होता है इच्छा को? झट उठी, झट गिरी। कभी इसीलिए गिरी कि पूरी हो गई। और कभी इसीलिए गिरी कि पूरी होने की आस नहीं रही। है कोई इच्छा जो शाश्वत बनी रह जाती हो? जो इच्छा शाश्वत बनी रह जाए, उसे फिर इच्छा नहीं मुमुक्षा कहते हैं। वही हर जीव की सनातन इच्छा है – मुक्ति, मुमुक्षा। पर हम उस इच्छा को दरकिनार कर, छोटी, टुच्ची इच्छाओं में लिप्त हो जाते हैं। दो रुपया, चार रुपया, बीस हज़ार, पच्चीस हज़ार।


