प्रश्नकर्ता: क्या ये वर्तमान में जीने की बात हो रही है?
आचार्य प्रशांत: सैद्धांतिक रूप से हाँ। लेकिन, जब आप कहते हैं नाउ (अभी), तो उससे आपका आशय क्या है? मन के लिए नाउ जैसी कोई चीज़ होती नहीं है। शब्दों में आप भले ही कह दें: ‘अभी’, ‘वर्तमान’, लेकिन मन वर्तमान को भी अतीत और भविष्य की श्रृंखला में एक कड़ी के रूप में ही देखता है। तो ये जो आजकल प्रचलित मुहावरा है, लिविंग इन द मोमेंट, वर्तमान में जीना, ये बड़ा अर्थहीन है। इससे हमें ये दिलासा मिल जाता है कि जैसे हमें कुछ पता चल गया। जैसे कि हमें कोई सूत्र मिल गया हो, अच्छा जीवन जीने के लिए : ‘*लिविंग इन द नाउ, लिविंग इन द प्रेसेंट*।’
पर ये है क्या? क्या आप वर्तमान की बात कर पाते हैं, जब आप पूर्णतया शांत होते हैं? कोई बात नहीं होती, तो नाउ की भी कैसे होगी? शांत ना भी हों, आप सो गए हों, तब कोई नाउ बचता है क्या? सोते हुए भी, नाउ गायब हो जाता है। इसका मतलब यही है, कि ये जो नाउ है, जिसे हम कहते हैं, द प्रेसेंट मोमेंट, ये और कुछ नहीं है, ये मन की एक लहर है। उसमें सत्य नहीं है, सत्य होता, तो चेतना की अलग-अलग स्थितियों में, वो आता-जाता नहीं।
सत्य का काम ही नहीं है, आना-जाना। जो आए-जाए, वो मानसिक उथल-पुथल है, बस।
'वर्तमान', बड़ा सुन्दर शब्द है। 'वर्तमान' शब्द की गहराई में जाएँगे, तो कुछ राज़ खुलेगा। 'वर्तमान' का अर्थ होता है: वो जो है और वो समय की धारा में एक बिंदु नहीं है। वर्तमान वो, जो वर्तता है। वो, जो है। वो जो है, वो किसी

