प्रश्न: (किसी ग्रन्थ से सवाल पूछते हुए) इन्होंनें जो ७० जगहों की बात की है, वो क्या है?
आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं, हज़ारों तीर्थ हैं, उन सब तीर्थों में जाने से जो मिलता है, वो सुनने से ही मिल जाता है। ७० तीर्थ करो, इससे अच्छा, सुनो। वो काफ़ी है।
श्रोता १: सर, एक वाक्य है: “आई केन-नॉट ईवन वन्स बी अ सैक्रिफाइस टू यू”।
वक्ता: मेरी इतनी भी हैसियत नहीं है कि मैं तेरे सामने न्य़ौछावर हो सकूँ। अगर ये भी कहूँ कि मैं तेरे चरणों का दास हूँ, तो ये भी अतिश्योक्ति होगी। मैं तो ऐसा भी नहीं कि तुझ पर कुर्बानी की तरह चढ़ाया जा सकूँ। मैं ये तो कह ही नहीं रहा कि मैं तुझसे गले मिल सकता हूँ, मैं तो ये कह रहा हूँ कि मेरी इतनी भी औकात नहीं हैं कि मैं तेरे पाँव छू सकूँ।
श्रोता २: सर, जब सुनने की बात हो रही थी, तब ये तो समझ आ गया था कि हम जो कर रहे हैं सुनने में, वो मशीन जैसा ही कुछ है। सुन रहे हैं, मैमोरी से ले रहे हैं और प्रतिक्रिया कर रहे हैं, पर ये कब समझें कि हम सच में सुन रहे हैं?
वक्ता: तुम यही जान लो कि तुम नहीं सुन रहे हो। क्योंकि ये शक, और सुरक्षा की ये कोशिश, कि मुझे पक्का हो जाए कि अब मैं सुन रहा हूँ, ये सिर्फ़ तभी तक होगी जब तक नहीं सुन रहे हो। जिस क्षण सुन रहे होगे, ये चाहत ही नहीं बचेगी कि पक्का हो जाए न कि मैं सुन ही रहा हूँ। जिसको प्रेम नहीं होता, वो ही ये पक्का करने की कोशिश करता रहता है कि “प्रेम है ना?” “प्रेम है ना?” “प्रेम है ना?”; जिसको होता ही है, उसके मन में ये सवाल उठता ही नहीं है कि पूछूँ।

