प्रश्नकर्ता: जैसे पता चला कि शरीर का होश या देहभाव शुरू से ही होता है तो इससे दूसरी तरफ़ जाने की क्या संभावना है?
आचार्य प्रशांत: दूसरी तरफ़ वही जाएगा न जिसको दूसरी तरफ़ लाभ है। जिसको शरीर की तरफ़ रह कर के आराम ना मिल रहा हो, शांति ना मिल रही हो वही दूसरी तरफ़ जाएगा। जिसको एहसास होने लग गया, दिखने लग गया कि शरीर से जितना ज़्यादा ताल्लुक़ रखते हैं, जितना अपनापन रखते हैं, जितना तादात्म्य रखते हैं, जीवन में कमज़ोरी, बेचैनी उतनी बढ़ती है वो ही जाएगा दूसरी तरफ़। तो फिर दूसरी तरफ़ जाने की विधि भी यही है कि देख लो शरीर बने रह कर पा क्या रहे हो।
हम असल में पूरी तरह शरीर भी नहीं बने हुए हैं, हम त्वचा बने हुए हैं। शरीर में तो जो कुछ भी है अगर आपके सामने रख दिया जाए तो उठ कर भागेंगे। जब हम कहते हैं कि हममें देहभाव सघन है तो वास्तव में वो त्वचा भाव और केश भाव होता है। खाल और बाल! हमारा इनसे तादात्म्य होता है। अभी आपकी आँत निकाल कर आपके सामने रख दी जाए फिर? और आँतों के भीतर क्या है आप जानते हैं। मौसम महक उठेगा बिलकुल। अपने ही भीतर जो हम लेकर घूम रहे हैं माने इस देह के भीतर जो लेकर घूम रहे हैं वो सामग्री कुछ बहुत सुंदर-सुगंधित तो नहीं है। है क्या? जो इन छोटी-छोटी बातों पर विचार करने लगता है कि मैं क्या शरीर बन कर घूम रहा हूँ? शरीर बाहर से खाल है अंदर से मल-मूत्र है। मुझे मल बन कर घूमना है क्या? देह बन कर घूम रहा हूँ तो अब देह में मेरा कुछ भी नाम हो सकता है — अमित। पर अगर मैंने कह दिया कि देह हूँ, तो वास्तव में मेरा नाम हो गया अमित मल। आइए अमित मल साहब!
ये छोटी बातें व्यक्ति अगर अपने जीवन में देखने लगे तो देह से खुद ही पीछे हटने लगेगा। कोई ज़रूरी काम करना है आपको, ऐसा जो आपको वास्तव में प्राणों से ज़्यादा प्यारा है और वो करते हुए आपको नींद आने लगे। उसके बाद आप कैसे देह बने रह जाते हो अगले दिन भी, बोलो?
आज की रात कीमती है, कोई ज़रूरी काम करना है, और आप कर रहे हो और ये देह सोने को आतुर हो रही है, उसी रात देह से नाता टूट जाना चाहिए। "तू सगी नहीं है मेरी आज दिख गया। क्या मुझे करना, क्या तू कर रही है? तेरे इरादे नापाक़ हैं। कम-से-कम तेरे इरादे और मेरे इरादों में कोई साम्य नहीं है। मुझे काम करना था और तुझे सोने की पड़ी है।"


