युक्त्वाय मनसा देवान्सुवर्यतो धिया दिवम्। बृह्वज्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्रसुवाति तान्॥
स्वर्ग तथा आकाश में गमन करने वाले, बृहद् प्रकाश संचरित करने वाले वे सविता देव हमारे मन तथा बुद्धि से (मन तथा इंद्रियों के अधिष्ठाता) देवों को संयुक्त करके उन्हें प्रकाश की ओर प्रेरित करें।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय २, श्लोक ३)
आचार्य प्रशांत: अब ये समझना होगा। बहुत सारे देव हैं, वैदिक साहित्य में अनगिनत देवों का उल्लेख मिलता है। ये बहुत सारे देव क्या हुए, बताइए? जो मूल सूत्र हैं उनका उपयोग करके बताइए ये बहुत सारे देव क्या हुए?
आत्मा, या ब्रह्म, या परमात्मा तो वो हुआ जो मूल अहम् वृत्ति के गल जाने के बाद शेष रहता है। ठीक? उससे निचले तल पर, ब्रह्म से निचले तल पर आती है अहम् वृत्ति। अहम् वृत्ति को संबोधित किया गया है प्रथम देवता, सविता देवता कहकर के, या देवों के देव कह कर के, सबसे बड़ा देवता कह कर के। तो सबसे बड़ा देवता कौन है? मूल अहम् वृत्ति। तो फिर जो ये हज़ारों और देवता हैं ये क्या होंगे? ये जो आपके खंडित अहम् के अलग-अलग आराध्य होते हैं, पूज्य होते हैं, वो होते हैं अन्य छोटे-मोटे देवी देवता।
एक क्षण है जब आप कह रहे हैं कि 'मैं व्यापारी', तो इस वक़्त आपका आराध्य कौन हुआ? लक्ष्मी।

