प्रश्न: ‘एकमेव अद्वितीय्म’ में कहा गया है कि सृष्टी बन जाने के बाद अब भी वह सद्वस्तु वैसी की वैसी ही है, इसे कैसे समझे?
आचार्य प्रशांत: सृष्टी बन जाने के बाद, सृष्टी बन जाने के पहले इन सब संद्धर्भो में नहीं बात कि जा सकती है सद्वस्तु की। तुम ये मान ही रहे हो कि समय का प्रवाह है उसमें एक बिंदु पर किसी सद्वस्तु से ये संसार बन जाता है। तुम कहते हो एक क्षण आता है जब ये संसार बन जाता है और उस क्षण से पहले संसार नहीं था सिर्फ वो सद्वस्तु थी, परमात्मा था या शून्य था।
मन इतना रमा हुआ है समय में कि उसने समय को सृष्टी से और सद्वस्तु से दोनों से ऊपर बैठा दिया है। वो कह रहा है समय तो है ही समय तो चल ही रहा है। सृष्टी के पहले भी समय था, सृष्टी के बाद भी समय होगा। समय सृष्टी ही है। सृष्टी के बाद क्या समय होगा, सृष्टी से पहले क्या समय होगा? ये इस तरीके के जो सवाल होते है की सृष्टी से पहले क्या था? ये बड़े मूर्खता पूर्ण सवाल होते है।
दिक्कत इसमें ये आती है कि मन के लिए ये कल्पना ही कर पाना बड़ा मुश्किल है की समयातीत क्या है। मन यहाँ तक तो कल्पना कर ले जाता है की कोई बड़ा विस्फोट हुआ, उस से सृष्टी अस्तित्व में आ गयी और ये सब एक कहानी की तरह हमारी आँखों के सामने कौंध जाता है। विज्ञान ने तो बिग बैंग थ्योरी दे ही दी है और इस तरह की और सिद्धान्त भी जो समय में ही चलती है। पंथों ने धर्मो ने भी इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं सोचा है कि ब्रह्मा ने सृष्टी की रचना कि और रचना से पहले भी तो ब्रह्मा थे। अब रचना से पहले कहाँ कुछ हो सकता है। पहले और बाद, ये दोनों तो शब्द ही समय के भीतर है, पहले और बाद में ये दोनों तो शब्द ही समय के भीतर हैं।


