प्रश्नकर्ता: सर, लोग मेरी बातों को उलटा समझ लेते हैं। और मैं इस बात से दो सालों से परेशान हूँ। लोग मेरी बात का उलटा अर्थ लेते हैं और मैं परेशान हूँ।
आचार्य प्रशांत:: परेशान लोगों के खातिर हो या अपने खातिर हो? परेशानी क्यों है? परेशानी इसलिए है कि लोगों ने उलटा अर्थ कर लिया और वो समझ नहीं पाए या परेशानी इसलिए है कि अगर वो तुम्हारा मनचाहा अर्थ करते, तो तुम्हें कुछ हासिल हो जाता?
यह दो बहुत अलग-अलग बातें हैं। इनको अलग ही समझना।
प्र२: सर, मेरे बच्चे हैं, मेडिकल कॉलेज में पढ़ते हैं, वह कहते हैं कि, "हम जो कहते हैं, लोग हमारी बातों का ग़लत अर्थ लगा लेते हैं, जबकि हम सही हैं। हमारी मित्रता नहीं हो पाती, ऐसा क्यों?" ऐसा क्या है?
आचार्य: फिर कहता हूँ। मैं आपको शरबत ऑफ़र (प्रस्ताव) करूँ, या यहाँ यह बिस्कुट रखे हैं, मैं आग्रह करूँ कि, 'लीजिये!' आप ना लें और मुझे बुरा लग जाए, तो इस बुरा लगने की दो वजह हो सकती हैं। और यह दो बहुत अलग-अलग वजहें हैं। इन्हें अलग-अलग ही समझना पड़ेगा। एक तो यह, कि यह मेरा अपमान हुआ कि मेरे अतिथि आए, मैंने उन्हें कुछ निवेदन किया, भेंट किया, और उन्होंने इनकार कर दिया। हाँ? इसमें, जो मेरा पूरा मतलब है, वो अपने-आप से है। मेरे अहंकार को चोट लगी है कि मैंने आपको कुछ प्रस्तुत किया और आपने उसे अस्वीकार किया।
और एक दूसरी वजह भी हो सकती है। दूसरी वजह यह हो सकती है कि मेरे मेहमान आए थे। इतनी धूप में आए थे और दोपहर का समय था और भोजन का समय था। और मैंने उन्हें कुछ आग्रह किया और उन्होंने नहीं लिया। बेचारे, भूखे रह गए। बेचारे. प्यासे रह गए। इस दूसरे बुरा लगने में मेरी पूरी


