आचार्य प्रशांत: सूफी था एक, उसके घर खाने को ज्यादा रहता नहीं था | बस उतना कि अपना, सुबह खा लिया अपना | शाम की ज्यादा फिकर नही, शाम को मिल गया तो अच्छा, नही मिला तो भी कोई बात नही और जो सूफी साधना है उसमें कम खाने पर बड़ा जोर रहता है, वैसे भी | एक बार उसके यहाँ बहुत सारे मेहमान आ गये | उसका एक मुरीद आया, बोला, इतने आ गये हैं | इनको खाने को भी देना होगा, कहाँ से देना है ? यहाँ तो गिनती की कुछ रोटियाँ पड़ी हुई हैं, तो कैसे दोगे ? तो उसने कहा, ऐसा करो जितनी रोटियाँ है, उनको एक थाल पर रखो और उन पर कपड़ा डाल दो | उन पर कपड़ा डाल दो और मेहमानों के सामने रख दो और मेहमानों से कहना, “जिसको चाहिए हो बस ऐसे कपड़ा हटाये, अपना निकालता जाये” |
अब मेहमान आये थे १०-२० | अपना खाने बैठे और छक करके खाते गये | कपड़ा उठाते, नीचे से रोटी निकालते और खाते जाते | उसके सारे जितने चेले थे सब देख हैरान की ये हो क्या रहा है | तो देखें सूफी बाबा की ओर, वो बोले, कुछ नहीं खाने दो | एक से रहा नहीं गया | वो गया उसने कपड़ा हटा ही दिया कि कैसे रोटियाँ ही रोटियाँ निकल रही हैं और कपड़ा हटाया तो क्या देखता है, एक भी रोटी नहीं है, और कहानी यहाँ खत्म हो जाती है |
बात चल रही थी आदमी को कितने पैसे की जरुरत है और ऐ.टी.एम. के आने से ये हुआ है कि अब आपको जेब में नहीं रखना पड़ता, नहीं समझ में आ रही बात ?
श्रोता: ‘मन’ खाता है | तनख्वाह मन में होती है |
आचार्य जी: आप निकालते चलो | ये मत पूछो कहाँ से आयेगा | हाँ, जाँचने जाओगे कि अब कितना बचा | कल और निकाल पाऊँगा कि नही, तो पाओगे कि कुछ नही है | आप बस निकालते चलो, पर निकालो उतना ही जितना पेट को जरूरत है और जाँच ही मत करो कि बकाया कुछ है भी, कि नहीं है | वो जो कपड़े के नीचे ढका हुआ था, वो बकाया था और जो आप निकाल रहे हो, उतने की आप को जरुरत है | आप बकाया मत जाँचा करो | आपको जो निकालना है, निकालो |


