प्रश्नकर्त्ता: आचार्य जी, भारत अब कोरोना महामारी से संक्रमित लोगों की संख्या में चौथे स्थान पर आ चुका है। अमेरिका लंबे समय से सबसे ऊपर, पहले स्थान पर है ही। भारत और अमेरिका दोनों ही जनतंत्र की मिसाल माने जाते हैं। अमेरिका सबसे शक्तिशाली जनतंत्र, और भारत सबसे बड़ा जनतंत्र। इन दोनों ही जनतंत्रों को कोरोना ने पस्त कर दिया है। यूरोप की भी जो बाकी जनतांत्रिक व्यवस्थाएँ हैं: फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी आदि, उनका भी बुरा हाल है।
इसके विपरीत मैं देख रहा हूँ कि चीन, जहाँ सत्ता का केंद्रीकरण है, वहाँ पर इस महामारी को रोक लिया गया। चीन का मीडिया, ख़ास तौर पर ग्लोबल टाइम्स और पीपल्स डेली, इस बात को चीन की कम्युनिस्ट व्यवस्था की श्रेष्ठता के रूप में प्रचारित कर रहे हैं। वो कह रहे हैं कि जनतांत्रिक व्यवस्थाओं का हाल देखकर यह सिद्ध हो जाता है कि चीन की सेंट्रलाइज्ड ओथेरेटेरियन (केंद्रीकृत अधिकारवादी) व्यवस्था जनतंत्र से बेहतर है। क्या समझें?
आचार्य प्रशांत: निश्चित रूप से जनतंत्र बाकी जितनी भी राजनैतिक व्यवस्थाएँ मनुष्य अभी तक सोच पाया है, और प्रयुक्त कर पाया है, उन सबसे बेहतर ही है। लेकिन जनतंत्र की कुछ शर्तें होती हैं। जनतंत्र आम जन के हाथ में ये ताक़त देता है कि वो अपने प्रतिनिधि चुनेंगे, नेता चुनेंगे, अपने सत्ताधारियों का निर्धारण वो स्वयं करेंगे। जब जनता के हाथ में यह ताक़त दी जाए, तो जैसा कि हम सब जानते हैं कि हर ताक़त, हर अधिकार अपने साथ एक कर्तव्य, एक ज़िम्मेदारी लेकर आता है। पुरानी बात है न? हम सब अवगत हैं, क्या? कि अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। ठीक है? तो जनतांत्रिक व्यवस्था में भी, फिर सरकार का भी और आम जनता का भी यह कर्तव्य बन जाता है कि वो अपनी चेतना, अपने मन, अपने ज्ञान, अपने निर्णयों के स्तर को इस लायक रखें, इतना ऊँचा रखें कि पता भी हो कि उन्हें क्या निर्णय करने हैं।
अगर किसी देश में जनतांत्रिक व्यवस्था है लेकिन जनता ही बेहोश है, तो वह जनतंत्र बड़ा अराजक हो जाएगा। चलता तो रहेगा, पर उसमें तमाम तरह के अंतर्विरोध रहेंगे, अंतरकलह रहेगी, गुटबाजियाँ रहेंगी, तमाम तरह की ऐसी गतिविधियाँ उसमें चलती रहेंगी, जिसमें जनता और राष्ट्र की ऊर्जा का अपव्यय होता रहेगा, जैसा कि तुम भारत में देखते ही होंगे।




