प्रश्नकर्ता: मन, आत्मा और मैं, जैसे कि मैं अतृप्त आत्मा हूँ, हम बोलते हैं या मैं बोलता हूँ तो उसमें से, मैं और अतृप्त चेतना हूँ तो…।
आचार्य प्रशांत: सब पता है क्यों मुस्कुरा रहे हैं? क्योंकि अभी मैं गया भी नहीं, और आपने कहानियाँ बना लीं।
प्र: सवाल मन में आया इसलिए पूछ रहा हूँ कि मैं और…।
आचार्य: मैंने समझाया था कि हम अतृप्त आत्मा हैं?
प्र: नहीं, चेतना सॉरी।
आचार्य: चेतना, आत्मा सब बराबर हैं? कहीं भी कुछ भी चलेगा? अभी तो सामने बैठा हूँ और घपला कर दिया। चेतना, आत्मा सब बराबर है तो चेतना, आत्मा, नागम्मा, (श्रोतागण हँसते हुए।) थोड़ा ही तो अंतर है, चलने दो।
अतृप्त चेतना हैं अगर हम, तो क्या चाहिए हमें?
प्र: तृप्ति।




