प्रश्न: ज्ञान और भाग्य में बड़ा क्या है? क्या ज़्यादा महत्व रखता है – ज्ञान या भाग्य?
वक्ता: पहली बात तो हमें यह समझना पड़ेगा कि प्रश्न क्या है। ज्ञान से तुम्हारा अर्थ है – वो सब कुछ जो तुमने अर्जित किया है, जो तुमने पाया है। ज्ञान से तुम समझते हो कि, तुम्हारी पात्रता का पता चलता है, तुम्हारी योग्यता का पता चलता है। और भाग्य से तुम्हारा अर्थ है, वो जो सांयोगिक है, वो सब कुछ जिसमें तुम्हारी पात्रता के लिए कोई स्थान नहीं है, जो बस हो रहा है। तो जो सांयोगिक है, उसको तुम भाग्य समझते हो। बात समझ रहे हो?
पहली बात तो यह है कि इस सवाल में ही एक गहरी भूल है। तुम्हारा ज्ञान तुम्हारी योग्यता का द्योतक नहीं है। जितना भी ज्ञान तुम्हारे पास है, वो भी पूर्णतया सांयोगिक है। जो कुछ तुम जानते हो वो तुम्हारा ज्ञान ही है न? वो सब कुछ जो तुम्हारे अनुभवों से आया है, तुम्हारे अतीत से आया है, तुम किस घर में पैदा हुए, तुम किस घर में पले-बढ़े, तुमने क्या पढ़ा, तुम किन परिस्थितियों से होकर गुज़रे, उसी सब का जोड़ है तुम्हारा पूरा ज्ञान। वही सब जानकारी तुम्हारे मन में भरी हुई है। वही जानकारी तुम्हें कहीं से मिल गयी है, तुमने कहीं से पा ली है। उसमें तुम्हाराअपना कुछ नहीं है। यह मत मन लेना कि ज्ञान में तुम्हारा अपना कुछ है।
ये भ्रम तुम्हारे मन में क्यों आ रहा है, वो भी मैं तुम्हें बता देता हूँ। किताबों से तुमने हमेशा ज्ञान लिया है, और तुम्हारी शिक्षा व्यवस्था ने तुम्हें सिखाया है कि जिसके पास जितना ज़्यादा किताबी ज्ञान है, वो उतना ही सुपात्र है, उसकी योग्यता उतनी ज़्यादा है। यही सिखाया है न तुम्हारी शिक्षा व्यवस्था ने? तो तुम्हें लगता कि ज्ञान का पात्रता से कोई सम्बन्ध है। नहीं, ज्ञान का पात्रता से कोई सम्बन्ध नहीं है। तुम सब से कहीं ज़्यादा ज्ञान एक किताब को होता है। एन्साएक्लोपीडिया तो ज्ञान से भरे ही हुए हैं, उससे उनमें कोई पात्रता थोड़ी ही आ गयी है। दुनिया भर की जानकारी इन्टरनेट तुम्हें दे सकता है, उससे क्या हो गया? ये कोई पात्रता नहीं है। पात्रता तो है – समझना।


