माया बाहर नहीं, भीतर है || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)

प्रश्नकर्ता: माया की गति, आपने कहा, इतनी तेज़ है जैसे मक्खन में छुरी। हम समझ भी नहीं पाते और सब कुछ घट जाता है। तो फिर हम माया की गति कैसे कम करें ताकि हमको चुनाव का समय मिल जाए?
आचार्य प्रशांत: अच्छा हुआ मैंने कह दिया कि सवाल भेजिए अपने। नहीं तो क्या बोल रहा हूँ, क्या समझ रहे हैं।
अरे बाबा, माया की गति कम नहीं करनी है, अपनी अवस्था बदलनी है। अहंकार की यही निशानी है, वह अपने-आपको तो रखना चाहता है कायम – ‘मैं नहीं बदलूँगा'। वह सारा बदलाव कहाँ करना चाहता है? किसी दूसरे में। तुममें ही कुछ ऐसा होगा न कि माया आकर तुमको काट जाती है। तुम्हें अपने-आपमें बदलाव करने हैं। माया को कौन बदल सकता है?
माया क्या है?
तुम्हारी ही कमज़ोरियों का नाम है माया। तो जब तुम कहते हो कि, 'माया से मुझे लड़ना है', तो शायद तुम्हारा अंदाज़ा कुछ ऐसा होता है कि तुम्हें किसी बाहर वाले से लड़ना है, जबकि माया वास्तव में अगर तुम्हारी ही कमज़ोरी का नाम है, तो माया से लड़ने का असली अर्थ है स्वयं से लड़ना।
तो तुम कह रहे हो, “माया आकर हमें ऐसे काट जाती है जैसे मक्खन में छुरी, तो क्या करें?” बाबा, कटेगा तो वही न जो ठोस होगा। पानी को कौन काट सकता है? अहंकार ठोस होता है, जैसे ठंडा मक्खन। माया होती है गर्म छुरी। माया आकर झट से उसको काट जाती है। तुम ठोस रहो ही मत, तुम पिघल जाओ। मक्खन पिघला हुआ है तो कौनसी छुरी उसे काटेगी?
