क्यों कहते हैं कि व्यक्ति अपने पूर्वजन्मों का फल भोगता है? || (2019)

यद यच्च कुरुते कर्म शुभं वा यदि वाशुभं। पूर्वदेहकृतं सर्वमवश्यमुपभुज्यते।।
~ उत्तर गीता (अध्याय ३, श्लोक १२)
भावार्थ: मनुष्य शुभ अथवा अशुभ जो जो कर्म करता है, पूर्वजन्म के किए गए उन सब कर्मों का फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब जीवात्मा का पूर्वजन्म नहीं होता तो अपने कौन से कर्मों का फल भोगना पड़ता है, कृपया स्पष्ट करें।
आचार्य प्रशांत: आप जो कुछ भी बने बैठे हैं उसके फलस्वरूप आप कर्म करते हैं। जो भी कर्म आप करते हैं किसी परिणाम की आशा से करते हैं। कर्म अभी है, परिणाम आगे है। आपने कर्म करा ही इसीलिए ताकि परिणाम आए, तो परिणाम आने तक आपको आगे बढ़ते रहना होता है न? इसीको कहते हैं अगला जन्म लेना।
ख़त्म हो जाना था आपको इसी पल, उस ख़त्म होने को मुक्ति कहते हैं। पर आपने अपने-आपको समय के चक्र में बाँधना स्वीकार कर लिया क्योंकि कुछ पाने की आशा अभी बाकी है। जैसे कि आपसे कोई कह रहा हो कि, "उठ जाओ, चलो, संसार से बाहर उठो, समय के बंधन से निवृत्त हो जाओ", और आप कहें कि "नहीं, समय के बंधन से निवृत्त नहीं होना है क्योंकि समय से निवृत्ति हो गई तो भविष्य से भी निवृत्ति हो जाएगी। हमें तो अभी भविष्य से कुछ चाहिए, कुछ उम्मीदें हैं भाई। कुछ अतृप्त कामनाएँ हैं, वो चाहिए।" तो आपसे कहा जाता है "ले भाई! ले ले भविष्य।"

