क्या मित्रता या प्रेम के लिए विचारों का मिलना ज़रूरी है?

प्रश्नकर्ता: मैंने ये अक्सर पाया है कि मेरी सोच जो है, न घर में पत्नी और माँ के साथ मेल खाती है, और न ही काम पर बॉस और सहकर्मियों के साथ मेल खाती है। उस चक्कर में वाद-विवाद हो जाता है, या फ़िर मैं एक सुनिश्चित सी दूरी बना कर बैठ जाता हूँ। तो होता क्या है कि फ़िर मैं उनके साथ ज़्यादा घुलमिल नहीं पाता, साथ काम नहीं कर पाता। वो जो साथ काम करने का जो एक मौज है वो मैं खो देता हूँ। ये मेरी एक समस्या है।
आचार्य प्रशांत: सवाल को सब ध्यान से समझेंगे, इसके जो दो पक्ष हैं उनको देखेंगे। क्या दो पक्ष हैं? पहला पक्ष ये कहा कि, घर पर पत्नी हैं, माँ हैं उनके साथ सोच मेल नहीं खाती, और जब बाहर जाते हैं अपने व्यवसाय में, दफ़्तर में तो वहाँ जो सहकर्मी हैं, या जो वरिष्ठ बॉस इत्यादि हैं, उनके साथ सोच नहीं मिलती। तो नतीजे में क्या मिलती है? दूरी। और ये दूरी बनाने के तो हम सभी लोग अभ्यस्त हैं, इसी दूरी को तो हम कहते हैं कि सबकी अलग-अलग सोच है, और सबका अपना-अपना व्यक्तिगत क्षेत्र है। जिसको हम कहते हैं प्राइवेट स्पेस, *पर्सनल एरिया*। और उस व्यक्तिगत क्षेत्र के तुम बादशाह हो, वहाँ किसी को उल्लंघन नहीं करना चाहिए। वहाँ पर किसी का भी प्रवेश नहीं होना चाहिए। है न ?
तो हर आदमी को हक़ है अपनी सोच रखने का। जैसे ही हम ये कहते हैं हर आदमी को हक़ है अपनी सोच रखने का, वैसे ही हम ये भी तय कर देते हैं कि सबके अपने-अपने सुनिश्चित दायरे होंगे।
इन दोनों बातों का सम्बन्ध आप देख पा रहे हैं? तो (एक श्रोता की ओर बताते हुए) इनको हक़ है अपनी सोच रखने का, और उस सोच के केंद्र पर आप बैठे हैं। ऐसे समझ लीजिए कि नीचे चादर पर एक वृत्त, एक घेरा बना दिया जाए, उस घेरे के केंद्र पर कौन है? अखिल हैं। उस घेरे के राजा कौन हैं?
प्र: अखिल हैं।
