क्रान्तिकारी भगत सिंह, और आज के युवा || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्न: आचार्य जी, कल तेईस मार्च भारत में शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, इनको फाँसी इस दिन मिली थी। तब भगत सिंह मात्र तेईस वर्ष के थे। तो युवाओं को इनसे क्या प्रेरणा लेनी चाहिए अपने जीवन में? आप कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: अब यहाँ जितने लोग बैठे हैं, उसमें से कम-से-कम आधे तो हैं हीं युवा-वर्ग से। तो ये जो प्रश्नों का, सवालों का, समस्याओं का गठ्ठर मेरे सामने आया है, इसमें से भी आधी या आधी से ज़्यादा समस्याएँ युवाओं की ही हैं। और युवा माने क्या? बीस से पैंतीस, या बहुत विस्तृत करके बोलोगे तो पंद्रह से चालीस। आदमी की कुल उम्र का एक बहुत छोटा-सा अंश—तीसरा हिस्सा, चौथा हिस्सा, पाँचवा हिस्सा। तो युवावस्था में समय बिताते हो अपनी कुल उम्र का एक चौथाई या उससे भी कम, लेकिन समस्याएँ आ रही हैं आधी।
देख रहे हो, हो क्या रहा है?
जो समय जीवन का शक्तिकाल, स्वर्णकाल होना चाहिए था, उसी समय में सबसे ज़्यादा समस्याओं से घिरे हुए हो, बतौर एक युवा। क्यों घिरे हुए हो? कारण सीधा है। जहाँ जितनी ज़्यादा संभावना है, वहाँ उतना ही अधिक ख़तरा भी होगा ही होगा। आकाश की संभावना कभी पाताल के ख़तरे के बिना नहीं आती। शक्ति मिली है, यौवन मिला है, समय मिला है, तो उसी के साथ-साथ ये अभिशाप भी मिला है कि अगर सही तरीक़े से नहीं बिताओगे उस समय को तो बहुत दुःख पाओगे, बहुत मार खाओगे, बहुत ज़्यादा समस्याओं से ग्रस्त रहोगे।
जब जवान होते हो तब सबसे ज़्यादा आकर्षण घेरते हैं तुम्हें, हर तरीक़े के। अहम् की तो मूल भावना होती ही यही है कि संसार भोग के लिए है। “मैं अतृप्त हूँ, और संसार को भोगकर मुझे तृप्ति मिल जाएगी,” यही नाम है अहम् का। ठीक? ये धारणा वो रखता जन्म के प्रथम-पल से आख़िरी-पल तक है: “अधूरा हूँ मैं, और दुनिया में कुछ खोजूँगा, कुछ पाऊँगा तो पूरा हो जाऊँगा।" लेकिन दुनिया में खोज पाने की शक्ति और दुनिया को भोग पाने की शक्ति सबसे ज़्यादा होती है युवावस्था में। तो इसीलिए भोग की लालसा भी सबसे ज़्यादा युवावस्था में ही होती है। सारा ध्यान, सारा समय, सारी ऊर्जा बह निकलती है संसार की ओर―“दुनिया में ये पा लूँ,” "ये कमा लूँ,” "ये हासिल कर लूँ”। किसके लिए? अपनी उस अतृप्ति के लिए, जो वास्तव में किसी भी उपलब्धि से मिटने वाली नहीं है।



