त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणी मनसा सन्निरुध्या। ब्रह्मोडुपेण प्रतरेत विद्वानस्त्रोतांसि सर्वाणि भयावहानी॥
विद्वान पुरुष को चाहिए कि वह सिर, ग्रीवा और वक्षःस्थल इन तीनों को सीधा और स्थिर रखे। वह उसी दृढ़ता के साथ सम्पूर्ण इन्द्रयों को मानसिक पुरुषार्थ कर अंतःकरण में सन्निविष्ट करे और ॐकार रूप नौका द्वारा सम्पूर्ण भयावह प्रवाहों से पार हो जाए।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय २, श्लोक ८)
आचार्य प्रशांत: इसी तरह कहा है कि, "ब्रह्म की नौका के द्वारा सब भयावह प्रवाहों से पार हो जाओ।" कैसे? वही, सर को, गर्दन को, छाती को एक सीध में रखना है। इन्द्रियों को हृदय के पास रखना है, मन को भी। और फिर ब्रह्म रूपी नौका का प्रयोग करके इन भयावह जलों के पार हो जाना है। उपमा है सुंदर। छवि देख पा रहे हो?
ब्रह्म को यहाँ पर क्या कहा गया है? नाव है, यही तारेगी तुमको। और तुमने जो अपना ये मायाजाल रचा हुआ है इसको क्या कहा गया है? ये भयावह समुद्र है या नदी है जिसमें बिना तुम ब्रह्म की नाव के डूबे ही डूबे। अब ये क्या बात है, क्योंकि इस प्रतीक का इस्तेमाल भी इतना किया गया है, इतना किया गया है कि हम जब सुनते हैं तो हमें लगता है कि हमें बात पता है। जब हम सुनते हैं तो हमें लगता है कि बात पता है।
(एक श्रोतागण की ओर इशारा करते हुए) इनका क्या नाम है? क्या नाम है (जवाब आया 'अजितेश')। आप लोग हैं यहाँ पर, आप में से ज़्यादातर लोग 'अजितेश' शब्द का अर्थ नहीं जानते होंगे। 'अजितेश' शब्द आपके लिए बिलकुल वैसा ही है जैसे कि अगर मैं आपसे कह दूँ 'कुकुटु'। पर अगर मैं आपसे कह दूँ ‘कुकुटु’ तो ये बात आपके कान को चुभेगी क्योंकि आप इस शब्द से परिचित नहीं है। मैं 'अजितेश' कहता हूँ, आपको लगता है कि हम तो जानते ही हैं। 'अजितेश, ये रहा अजितेश, अजितेश'।

