*श्रोता:* सर क्या किस्मत जैसी कोई चीज़ होती है ?
*वक्ता:* जिसे तूम दुनिया कहते हो, उसमें जो भी कुछ तुम्हें दिखाई देता है, सुनाई देता है, जो भी भौतिक है, वो cause and effect के दायरे में आता है, कार्य-कारण के दायरे में।जैसे कि कोई करता है, जैसे कि कोई कर्ता है।पर जैसे- जैसे तुम इस जाल को, अपने देखने के दायरे को बड़ा करके देखते जाते हो, तुम्हें दिखाई पड़ता है कि जिसने जो कुछ भी किया उसे वो करना ही था क्योंकि उससे पहले एक घटना घट चुकी थी।
ऐसे समझो कि ‘A’ ।eads to ‘B’, ‘B’ ।eads to ‘C’, ‘C’ ।eads to ‘D’ और ऐसे करते के अल्टीमाटेली ‘Z’. ये एक छोटा सा ही पैमाना है पर इसको देख लेते हैं।अगर तुम एक छोटी दृष्टि से देख रहे हो, एक सीमित क्षेत्र को देख रहे हो तो तुम्हें ऐसा लगेगा कि ‘G’ ।eads to ‘H’ और तुम कहोगे कि ‘G’ ने कुछ किया, जिसकी वजह से ‘H’ हुआ।थोडा सा और बड़ा करोगे तो तुम कहोगे नहीं, ‘G’ ने कुछ नहीं किया, ‘F’ ने पहले ही कुछ कर रखा था जिस कारण ‘G’ होना ही था तो ‘F’ की वजह से ‘H’ हुआ।तुम थोडा और अपना दायरा बढ़ाओगे और तुम कहोगे नहीं, ‘E’ ने पहले ही कुछ कर रखा था जिस कारण ‘F’ होना ही था, तो ‘E’ की वजह से हुआ ।ऐसा करते तुम ‘A’ तक पहुँच जाओगे और दूसरी दिशा में देखना शुरू करोगे, तो तुम कहोगे कि नहीं ‘H’ पर बात रूकती नहीं है।एक बार ‘H’ हो गया तो अब ‘I’ का होना पक्का है।और एक बार ‘I’ हो गया तो अब ‘J’ का होना पक्का है।दोनों दिशा में तुम पाओगे कि अनंत है ।
जैसे कोई बहुत बड़ी मशीन हो और जिसमें बहुत सारे गियर्स और लिवर्स आपस में जुड़े हुए हों।बहुत बड़ी मशीन ।और उसमें तुम यहाँ पर एक बटन दबाओ और यहाँ पर एक लिवर घूमना शुरू हो।और अंत में वहाँ पर जो आखिरी पुर्ज़ा है वो भी घूमना शुरू होगा ।पहले एल लिवर घूमा, उससे कुछ और, उससे कुछ और, और आखिरी वाला भी घूम पड़ा।मशीन इतनी बड़ी हो सकती है कि यहाँ पर जो हो रहा है उस मूवमेंट को वहाँ तक पहुँचने में दस साल, बीस साल या दो हज़ार साल लग जाएँ, इतनी बड़ी भी मशीन हो सकती है।लेकिन जिस समय यहाँ पर पहले गियर घूमा था उसी समय ये पक्का नहीं हो गया था कि वो आखिरी भी घूमेगा? इसी का नाम क़िस्मत है ।


