आचार्य प्रशांत: तो सवाल है कि एक फ़िल्म आई थी 'द मास्क' के नाम से। उसमें जो मुख्य चरित्र था उसे एक मास्क मिल जाता है, एक मुखौटा मिल जाता है। उस मुखौटे के मिलने से उसे दुनियाभर की तमाम लड़ाइयों में जीत मिलने लग जाती है, शोहरत मिल जाती है, एक गर्लफ्रेंड मिल जाती है, बुरे लोगों की वो पिटाई लगा सकता है, ताक़त आ जाती है, ये सब हो जाता है। लेकिन अंततः दिखाई देता है कि वो उस मास्क से भी परेशान है और उस मास्क को एक नदी में बहा देता है। ऐसे ही हुआ था न?
अब सवाल है कि बाहर से मुखौटा आ रहा है तो भी आदमी परेशान है, और उस मूवी में यही दिखाया गया था कि मास्क के मिलने से पहले भी उसकी ज़िंदगी बड़ी साधारण, उबाऊ और बड़ी बोझिल सी थी। तो ज़ाहिर सी बात है कि सवाल उठेगा कि जब मास्क नहीं है तब भी बेचैन हैं और ऊबे हुए हैं, और मास्क मिल गया तब भी वो परेशानी का ही कारण बना उसे नदी में बहाना पड़ता है। तो करें तो करें क्या?
मास्क दो तरह के होते हैं, मुखौटे दो तरह के होते हैं। एक तो वो जो तुमने देख ही लिया जो उसे मिलता था और वो उसे लगा लेता था। वो जो चरित्र था जिम कैरी का। कितने लोगों ने वो मूवी देखी है? याद होगी अच्छे से, मज़ेदार मूवी थी। तो वो जो चरित्र था वो उसको लेता था, लगा लेता था। यह एक बाहरी मुखौटा था। चूँकि ये बाहरी था इसीलिए हमारी आँखों को साफ़-साफ़ दिखाई पड़ता था कि ये मुखौटा लगा रहा है। ऐसे ही होता था न?
एक दूसरा मुखौटा भी होता है। जो आँखों को दिखाई नहीं देता, जिसको तुम ये कभी ये कह ही नहीं पाओगे कि ये मुखौटा है, पर है वो मुखौटा ही। उसको कभी तुम ये कह नहीं पाओगे कि मुखौटा है क्योंकि मुखौटा, मुखौटा तब पता चलता है जब कभी तो वो उतार कर के रखा जाए। अगर कोई ऐसा मुखौटा है जिसे तुम दिन-रात ही पहने हुए हो, तो तुम भूल ही जाओगे कि ये भी तो नक़ाब ही है। अगर उसको पहनने की ऐसी आदत पड़ी है कि तुम्हें यह भ्रम हो गया है कि, "ये तो मेरा अपना चेहरा है", तो तुम उसे मुखौटा कह ही नहीं पाओगे। है वो भी मुखौटा ही।


