प्राणान्प्रपीड्येह स युक्तचेष्टः श्रीणे प्राणे नासिकयोच्छवसीता। दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान्मनो धास्येताप्रमत्तः॥
विद्वान् पुरूष को चाहिए कि आहार-विहार की सभी क्रियाओं को विधिवत् सम्पन्न करते हुए प्राणायाम की क्रिया करके जब प्राण क्षीण हो तो उसे नासिका से बाहर निकाल दे। जिस प्रकार सारथी दुष्ट अश्वों से युक्त रथ को अत्यन्त सावधानी से लक्ष्य की ओर ले जाता है, उसी प्रकार विद्वान् पुरूष इस मन को अत्यन्त जागरूक होकर वश में किये रहें।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (आध्याय २, श्लोक ९)
आचार्य प्रशांत: योग की दृष्टि से प्राण-वायु पर अनुशासन मन का अनुशासन हो गया न? चित्तवृत्ति निरोध हो गया। चित्त की वृत्ति क्या है? चंचलता। और चित्त जब चंचल होगा तो प्राण भी—प्राण माने श्वास इस अर्थ में—तो प्राण भी चंचल हो जाएँगे। चित्त से श्वास चंचल हो जाती है। तो योग ने कहा कि क्यों न हम श्वास को ही शांत और लय युक्त कर दें। श्वास अगर लीन हो गई, साँस संगीतमय और नियमित हो गई तो मन भी नियमित हो जाएगा। यह योग की दृष्टि से बात हुई।
वेदांत इसको कैसे देखेगा?
वेदांत कहेगा - देखो, प्राणायाम में तुम तीन भाग रखते हो। एक यह कि साँस अंदर जा रही है, उस पर ध्यान देना होता है, उसका अनुशासन। दूसरा, जब तुम श्वास को भीतर रोकते हो उसका अनुशासन। और तीसरा होता है साँस को बाहर छोड़ने का अनुशासन। भीतर जब तुम साँस लेते हो तो उसको योग में कहते हैं 'पूरक'। जब तुम भीतर साँस रोक लेते हो तो उसको कहते हैं 'कुंभक'। और जब तुम साँस छोड़ते हो तो उसे कहते हैं 'रेचक'। तो हम हैं जो कुछ भीतर ले रहे हैं, कुछ अपने भीतर रोक ले रहे हैं, और कुछ है जिसको अपने भीतर से, जिसको मैं 'मैं' कहता हूँ न, अपने भीतर से हम निष्कासित कर रहे हैं, ठीक है?

