एकाग्रता और आदतों का प्रभाव || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2017)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, किसी काम में पूरी तरह डूब नहीं पाता और मन यहाँ-वहाँ भागता है, एकाग्र नहीं हो पाता। मन को एकाग्र कैसे करूँ?
आचार्य प्रशांत: छोटी बीमारी हटाना चाहते हो, या बड़ी बीमारी?
प्र: बड़ी बीमारी।
आचार्य: बड़ी बीमारी हट गई तो छोटी अपने आप हट जाएगी।
अक्सर जो काम तुम कर रहे होते हो, वो इस लायक ही नहीं होता कि मन आकर उसमें ठहर जाए। हम मन के साथ ज़बरदस्ती करते हैं। हम मन से कहते हैं, “तू वो काम कर जिसमें तुझे कोई चैन नहीं दिख रहा”। अब तुम ज़्यादा ज़बरदस्ती करोगे तो हो सकता है मन कुछ समय के लिए मान भी जाए। इस ज़्यादा ज़बरदस्ती को कहते हैं ‘एकाग्रता’।
एकाग्रता हिंसा है मन के साथ। लेकिन हम चाहते वही हैं कि किसी तरीके से मन को कहीं ले जाकर रख दें।
मन ख़ुद जानता है कि उसे कहाँ नहीं रुकना। कहाँ रुकना है, इसका उसे पता नहीं होता। लेकिन वो ये जानता है कि वो चैन के लिए आतुर है; परेशानी कोई नहीं झेलना चाहता न। तो यही मन का स्वभाव है, मन को चैन चाहिए। जो काम तुम मन को दे रहे हो, मन को उसमें कोई चैन दिखाई नहीं दे रहा, तो मन इसीलिए उस काम में लगता नहीं है। ये है बड़ी बीमारी।
