प्रश्नकर्ता: लगातार अद्वैत में कैसे जिया जाए? कैसे ख़ुद से ख़ुद की दूरी तय करें?
आचार्य प्रशांत: अद्वैत में जीने के लिए अद्वैत को भूल जाइए। जो आपको याद है, वो अद्वैत नहीं हो सकता। जब तक आप हैं और आपकी याद है, तब तक द्वैत-ही-द्वैत है।
अद्वैत से बड़ा झूठ दूसरा नहीं, जब वो आदमी के मुँह से निकलता हो। ज्यों ही आदमी ने कहा, ‘अद्वैत’, वो क्या हो गया? द्वैत। तो छोड़िए, अद्वैत जैसा कोई शब्द है नहीं, अद्वैत कुछ नहीं होता। जब आप ईमानदारी-पूर्वक देख लेते हैं कि आपके जीवन में द्वैत-ही-द्वैत है, तब द्वैत के अतिरिक्त कुछ और उतरता है।
किस पर उतरता है?
आप पर नहीं उतरता। आप तो हैं ही नहीं, द्वैत-ही-द्वैत है। जब द्वैत-ही-द्वैत दिखने लग जाए तो समझ लीजिए कि समझने के लिए आप बचे नहीं, क्या समझेंगे? बात ख़त्म। ये अद्वैत है।
जब तक आपको कुछ भी समझ में आ रहा है, तब तक द्वैत ही है, और जब तक आप कुछ भी समझा पा रहे हैं, समझ लीजिए कि द्वैत ही है। जितने भी अद्वैत आपके सामने आएँ, सबको भगा दीजिए, सब झूठे हैं। अद्वैत जैसा कुछ होता नहीं, और ‘अद्वैत-अद्वैत’ कर-करके हम द्वैत को ही चमकाए जा रहे हैं।
और द्वैत में कोई बुराई नहीं, बस उसे झूठा नाम मत दीजिए। द्वैत को द्वैत कहिए, बिलकुल ठीक है। राजा है और राजा का बन्दर है। बन्दर बेचारे ने क्या पाप किया है? बन्दर को ‘बन्दर’ बोलो, चलेगा, बन्दर को ‘राजा’ बोलते हो तो दिक़्क़त हो जाती है।

