स्वात्मा हि प्रतिपादितः ~अवधूत गीता
आचार्य प्रशांत: यह सब जो दिखाई दे रहा है, यह एक ही है, जो 'मैं' हूँ।
आत्म माने ‘मैं’। इसका और मेरा तत्व एक है, अलग-अलग नहीं है।
प्रश्नकर्ता: यहाँ ‘स्व’ का प्रयोग क्यों है?
आचार्य: ‘स्व’ माने मेरा। जब ‘आत्मा’ कहा जाता है, तो कोई तो है न जो आत्मा की बात कर रहा है। अगर मात्र आत्मा है, तो उसमें ‘आत्मा’ शब्द का कोई ख़ास अर्थ ही नहीं रह जाता। ‘आत्मा’ माने ‘मैं’। अगर मात्र ‘मैं’ है, तो वो क्यों कहे ‘मैं’? किससे कहे, कैसे कहे? ‘स्व-आत्मा’ कहते ही कोई बन जाता है जो इस आत्मा पर दावा करता है।
‘प्रतिपादितः’ मतलब जो ये अलग-अलग दिखाई दे रहा है चारों तरफ़, जो प्रतिपादित है, जो विस्तीर्ण। ‘स्व’ माने ‘मैं, जो इस से अलग हूँ’। ‘अहंकार’ क्या हुआ? वो जो अपने आप को संसार से भी अलग माने, और आत्मा से भी अलग माने। वो दो-तरफा भेद में जीता है। ‘अहंकार’ माने हम, हम जैसे हैं, हम दो-तरफा अंतर, भेद करते हैं। “मैं कौन हूँ? मैं वो दरवाज़ा नहीं हूँ, ये ज़मीन नहीं हूँ, मैं मेरा पड़ोसी नहीं हूँ, मैं संसार तो नहीं हूँ।" हद-से-हद मैं ये कह देता हूँ कि, “मैं संसार में हूँ”, पर मैं ‘संसार’ तो नहीं हूँ।
दूसरी ओर अहंकार अपने आप को आत्मा से भी अलग करके देखता है। अहंकार अपने आप को जितनी उपाधियाँ देता है, वो आत्मा पर लागू ही नहीं होतीं। तो वो आत्मा से भी अपने आपको भिन्न देखता है। तो जब तुम कहते हो, “स्वात्मा हि प्रतिपादितः”, तो ‘स्वात्मा’ माने – अहंकार आत्मा की बात कर रहा है, ‘स्व’। और कह रहा है कि, “ये जो आत्मा है, यही संसार है।” अभी तक वो क्या कह रहा था? “संसार अलग, मैं अलग, और आत्मा अलग।” अब उसको दिखाई दे रहा है, “मैं, ये संसार, और आत्मा तीनों एक हैं। सब जो है, मेरा ही विस्तार है, मैं ही हूँ।”



