लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वं वर्णप्रसादं खरसौष्ठवं च। गंधः शुभो मूत्रपुरीषमल्पं योगवृत्तिं प्रथमा वदंति॥
शरीर की स्थूलता कम होना, निरोग होना, विषयों में आसक्ति न होना, शरीर में कांति-तेजस्विता होना, स्वर की मधुरता, शुभ गंध का होना, मल-मूत्र अल्प होना, ये सब योग की पहली सिद्धि है।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय २, श्लोक १३)
आचार्य प्रशांत: योग की दृष्टि से इन सब उपलब्धियों का जो अर्थ है वो स्पष्ट ही है। आसनों में पारंगत हो जाएँगे आप, मुद्राओं का अभ्यास करेंगे, प्राणायाम करेंगे तो जो देह है, काया है उसकी स्थूलता, उसका विस्तार, उसका मोटापा कम होगा। शरीर निरोग होगा क्योंकि न जाने कितनी बीमारियाँ हैं जो सिर्फ़ शरीर के स्थूल होने के कारण ही आती हैं।
आगे की जो बातें बोलीं हैं उसमें कुछ मन से सम्बंधित हैं, कुछ शरीर से सम्बंधित हैं। विषयों में आसक्ति ना होना, शरीर में कान्ति तेजस्विता होना; स्वर मधुर हो जाएगा, शरीर की गंध शुभ हो जाएगी, मल-मूत्र अल्प हो जाएँगे। ये सब दैहिक सुधार के लक्षण हैं। कुछ लक्षण इसमें से मानसिक भी हैं, जैसे की विषयों में आसक्ति ना होना।
वेदांत की दृष्टि से देखेंगे तो इस पूरी बात के अर्थ थोड़े भिन्न हो जाते हैं। शरीर की स्थूलता का कम होना अब एक नया अर्थ ले लेता है। आत्मा है और आत्मा का विस्तार है। आत्मा बिंदु मात्र है, सूक्ष्मतम, और जैसे-जैसे विस्तार हो जाता है उस बिंदु का, वैसे-वैसे स्थूलता बढ़ती जाती है। तो जिसको हम शरीर कहते हैं और जिसको हम मन कहते हैं वो वास्तव में एक ही विस्तार के दो नाम हैं। वो एक ही विस्तार की दो सीमाएँ हैं, दो हदें हैं,

