वृत्ति न अच्छी न बुरी, महत्वपूर्ण यह है कि वो समर्पित किसको है || श्रीदुर्गासप्तशती पर (2021)

आचार्य प्रशांत: ऋषि कहते हैं – “चंड और मुंड नामक दैत्यों के मारे जाने तथा बहुत सी सेना का संहार हो जाने पर दैत्यों के राजा प्रातापी शुम्भ के मन में बड़ा क्रोध हुआ और उसने दैत्यों की सम्पूर्ण सेना को युद्ध के लिए कूच करने की आज्ञा दी। वह बोला, ‘आज उदयुद्ध नाम के छियासी दैत्य सेनापति अपनी सेनाओं के साथ युद्ध के लिए प्रस्थान करें। कुम्भ नाम वाले दैत्यों के चौरासी सेनानायक अपनी वाहिनी से घिरे हुए यात्रा करें’।”
“पचास कोटिवीर्य कुल के और सौ धौम्र कुल के असुर सेनापति मेरी आज्ञा से सेना सहित कूच करें। कालक, दौर्हृद, मौर्य और कलकेय असुर भी युद्ध के लिए तैयार हो मेरी आज्ञा से तुरंत प्रस्थान करें। भयानक शासन करने वाला असुरराज शुम्भ इस प्रकार आज्ञा के सहस्त्रों बड़ी-बड़ी सेनाओं के साथ युद्ध के लिए प्रस्थित हुआ।”
“उसकी अत्यंत भयंकर सेना आती देख चंडिका ने अपने धनुष की टंकार से पृथ्वी और आकाश के बीच का भाग गुंजा दिया। राजन! तदनंतर देवी के सिंह ने भी बड़े ज़ोर-ज़ोर से दहाड़ना आरंभ किया, फिर अंबिका ने घण्टे के शब्द से उस ध्वनि को और भी बढ़ा दिया। धनुष की टंकार, सिंह की दहाड़ और घण्टे की ध्वनि से सम्पूर्ण दिशाएँ गूँज उठी। उस भयंकर शब्द से काली ने अपने विकराल मुख को और भी बढ़ा लिया तथा इस प्रकार वे विजयिनी हुईं।”
“उस तुमूल नाद को सुनकर दैत्यों की सेनाओं ने चारों ओर से आकर चंडिका देवी, सिंह तथा काली देवी को क्रोधपूर्वक घेर लिया। राजन! इसी बीच में असुरों के विनाश तथा देवताओं के अभ्युदय के लिए ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु तथा इन्द्र आदि देवों की शक्तियाँ, जो अत्यंत पराक्रम और बल से सम्पन्न थी, उनके शरीरों से निकलकर उन्हीं के रूप में चंडिका देवी के पास गईं। जिस देवता का जैसा रूप, जैसी वेश-भूषा और जैसा वाहन है, ठीक वैसे ही साधनों से सम्पन्न हो उसकी शक्ति असुरों से युद्ध करने के लिए आई।”
“सबसे पहले हंसयुक्त विमान पर बैठी हुई अक्षसूत्र और कमंडलु से सुशोभित ब्रह्माजी की शक्ति उपस्थित हुईं, जिसे ब्रहमाणी कहते हैं। महादेव जी की शक्ति वृषभ पर आरूढ़ हो हाथों में श्रेष्ठ त्रिशूल धारण किए महानाग का कंकण पहने, मस्तक में चंद्ररेखा से विभूषित हो वहाँ आ पहुँचीं। कार्तिकेय जी की शक्तिरूपा, जगदंबिका उन्हीं का रूप धारण किए श्रेष्ठ मयूर पर आरूढ़ हो हाथ में शक्ति लिए दैत्यों से युद्ध करने के लिए आईं। इसी प्रकार भगवान विष्णु की शक्ति गरुड़ पर विराजमान हो शंख, चक्र, गदा, शंडधनुष तथा खड्ग हाथ में लिए वहाँ आईं।”

