आचार्य प्रशांतः तरुणा कह रही है कि, "दीवाली का जब से माहौल बना है तब से सी.आई.आर. (संस्था के अंतर्गत होने वाले मासिक कोर्स) अटेंड (भाग लेना) करना और मुश्किल हो गया है। कह रहीं हैं कि जब से सीरीज शुरू हुई थी तब से ही कुछ आंतरिक बाधा सी थी पर जब से ये त्यौहारों का मौसम आया है तब से तो बड़ा मुश्किल है। तो कृपया प्रकाश डालें।"
प्रकाश क्या डालूँ, प्रकाश ही प्रकाश है। इतनी मोमबत्तियाँ, इतनी झालरें, इतने दिये; घर जगमग है मैं क्या प्रकाश डालूँ? जिसे नकली रौशनी में जीना हो, जिसकी बाध्यता हो, मजबूरी हो नकली रौशनी में जीने की, उसे असली रौशनी से तो मुँह चुराना ही पड़ेगा न, तरुणा?
जैसे हमारे त्यौहार होते हैं, जिन तरीकों से हम उन्हें मनाते हैं, उनमें सब कुछ कुत्सित, गर्हित और नारकीय होता है। वो हमारी चेतना को और ज़्यादा तामसिक बना देते हैं। हमारे सबसे भद्दे चेहरे हमारे त्यौहारों में निकल कर आते हैं।
बड़ा दुर्भाग्य है हमारा कि भगवान के नाम पर हम जो कुछ करते हैं उसमें भगवत्ता ज़रा भी नहीं होती। अब अगर आपके चारों ओर वही सब माहौल बन रहा होगा, और बनता ही है – समाज, कुटुंब, परिवार सब मिलकर के वो माहौल रचते हैं। तो आपको बड़ी दिक्कत हो रही होगी मेरी बातें सुनने में।
कहाँ तो टीवी आपको लगातार बता रहा होगा कि दीवाली पर खुशियाँ घर लाइए और यहाँ ये आदमी बैठा हुआ कुर्ता पहन कर (अपनी ओर इशारा करते हुए), वो आपसे कह रहा है कि (व्यंग करते हुए), “खुशियाँ...”
(सभाजन हँसते हैं)


