श्रोता: सर, मुक्ति तो आत्मा से होती है, शरीर तो बन्धनों से जुडा ही रहेगा। जिसके पास कुछ नहीं है उसकी हर चीज़ पाने की कोशिश रहेगी और जिसके पास हर चीज़ है वो उसको बचाने की कोशिश करेगा। कुछ तो है जो चलता ही रहेगा, मुक्ति तो सिर्फ आत्मा की होती है।
वक्ता: निकिता, तो शरीर को रहने दो न बन्धन में, तुम क्यों हो बन्धन में ?
श्रोता: सर, मेरा शरीर तो आत्मा से भी जुड़ा हुआ है।
वक्ता: तुम क्यों हो बन्धन में? आत्मा हमने नहीं देखी, शरीर तुम्हारा दिख रहा है हमें। आत्मा तो कल्पना है। न तुमने देखी ना किसी और ने। है कोई यहाँ जो आत्मा वगैरह देखता हो? सुनी-सुनाई बातों पर हमें नहीं चलना है। किसी ने उछाल दिया- मोह और माया और मद और मत्सर और बन्धन। कोई उछाल रहा है- आत्मा, परमात्मा और ब्रह्म। मैं समझ रहा हूँ- इलाहाबाद है!
(श्रोता हँसते हैं)
पर बात ज़रा प्रामाणिक करना। ठीक है ? बात ज़रा प्रामाणिक करेंगे। अभी चल रहा था कुम्भ मेला, सब गए हैं कमाने। क्या? पता नहीं। पुण्य। कहाँ है? कोई लगाओ पुन्योमीटर। वो नापेगा कितना कमा लिया। कल्पनाओं का कोई अंत नहीं है आदमी की। आदमी के दिमाग की कल्पनाओं का कोई अंत नहीं है। हम तो आत्मा हैं! अगर तुम आत्मा हो तो कुर्सी पर कौन बैठा है? तुम अगर आत्मा हो गाल पर तुम्हारे? *(गाल पर हाथ से मारने का इशारा करते हुए)*। तुम तो आत्मा हो, शरीर से तुम्हें मतलब?


