प्रश्न: आचार्य जी, अध्यात्म में संगीत का क्या महत्त्व है?
आचार्य प्रशांत जी: न तुम्हें अपनी वृत्तियों का पता है, न तुम्हें सत्य का पता है। तुम्हारे लिए दोनों ही बहुत दूर की बातें हैं।
हम इतने अज्ञान में जीते हैं कि हमें दोनों का ही नहीं पता – न हमें मन की गहराईयों का पता है, न हमें आत्मा का पता है। मन के अंधेरों में जो वृत्तियाँ छुपी बैठी हैं हमें उनका कुछ पता नहीं। और हमें सत्य का भी पता नहीं। तो जब कुछ ऐसा होगा कि तुम्हारी वृत्तियाँ लपककर सामने आएँ, तो वो भी तुम्हें लगेगी नई बात ही।
इसका मतलब ये नहीं है कि सत्य का अनुभव हो गया।
किशोर लड़के को जब पहली बार कामोत्तेजना चढ़ेगी, तो उसका उसको कोई पूर्वानुभव होगा? पहली बार हुआ न? इसका मतलब ये थोड़े ही है कि कोई पारलौकिक घटना घट गई है। ये तो बस वृत्तियाँ हैं जो अब सामने आईं हैं।
‘अज्ञात’ और ‘अज्ञेय’ में अन्तर होता है। वृत्तियाँ हमारी हमसे अज्ञात रहती हैं, हमें उनका कुछ पता होता नहीं। पर समय-समय पर उनमें उभार आता रहता है, तो वो सामने आ जाती हैं, प्रत्यक्ष हो जाती हैं । सत्य अज्ञेय है, उसका कुछ पता हो ही नहीं सकता। वो कभी नहीं सामने आने वाला।

