रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार
रहिमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ता हार
संत रहीम
वक्ता: “जो तुम तोड़ो पिया, मैं नाही तोडू रे”, तुम्हारा ही हक़ है कि नाराज़ हो सको। क्योंकि तुम ही हो जो नाराज़ हो कर भी नाराज़ नहीं होओगे। तुम ही हो जो गति करते हुए भी अचल रह जाओगे। तुम ही हो जो बाहर से लाल-पीले होते हुए भी भीतर रंग-हीन रह जाओगे। हम नहीं हो सकते नाराज़ क्योंकि हम जब नाराज़ होते हैं तो हम नाराज़ ही हो जाते हैं। हम जब क्रोधित होते हैं तो हम क्रोध ही बन जाते हैं। हम नहीं हो सकते नाराज़। तुम्हें पूरा हक़ है नाराज़ होने का।
सिर्फ़ उसी को नाराज़गी का हक़ है, जो नाराज़ हो ही ना सकता हो। सिर्फ़ उसी को गति का हक़ है, जो अपनी जगह से हिल ही ना सकता हो। सिर्फ़ उसी को हज़ारों में खो जाने का हक़ है, जो कभी खो ही ना सकता हो। सिर्फ़ उसी को रूठने का हक़ है, जिसका प्रेम अनंत हो।
“रूठे सुजन मनाइए जो रूठे सौ बार”


