प्रश्नकर्ता: सर, कहते हैं पुराने जन्म में जो हमने कर्म किया है वो अब हम भुगतेंगे इस जन्म में; ये एक तरह से मूर्खता नहीं है? अगर अपने पुराने जन्म में ग़लत काम किए हैं, अगर पुराना जन्म होता है तो वो सज़ा हमें उसी समय मिलना चाहिए। अब ये थोड़े ही न कि पिछले जन्म में जो मैंने किया उसकी सज़ा आज मिल रहा है। अगर मैं कोई ग़लत काम आज कर रहा हूँ अब सज़ा मुझे अभी मिल रही है तो ये सही है, पर ये?
आचार्य प्रशांत: सज़ा की परिभाषा अलग-अलग होती है न बेटा। तुम्हें एच.अई.वी का इंजेक्शन लगा दिया जाए तुम अच्छे से जानते हो उसको बनने में सालों लग जाते हैं। एच.अई.वी वायरस तुम्हारे शरीर में घूमता रहे, घूमता रहे लेकिन तुम्हें एड्स कई सालों बाद होगा। वो तब होगा जब तुमको टी.बी हो जाएगी, निमोनिया हो जाएगा तो उसको एड्स कहते हैं कि अब तुम्हारी प्रतिरोध क्षमता इतनी गिर गयी है कि तुम्हें और कई बीमारीयाँ लग गयी। उसमें समय लगता है, अब तुम कब कहोगे कि सज़ा मिली, ये तुम्हारी बुद्धि पर है। अगर तुम्हारी नज़र सूक्ष्म है तो तुम कह दोगे कि सज़ा तो तभी मिल गई थी जिस दिन इंजेक्शन लगा था पर दुनिया में ज़्यादातर लोगों को ये समझ में नहीं आता कि सज़ा मिल गई। उनको सज़ा का पता तभी चलता है जब वो बुरी तरह भुगतते हैं तो उन्हें दस साल बाद पता चलता है। ये कर्मफल का सिद्धांत है। तो तुमने जो बात कही वो ठीक है कि फल तो तत्काल मिलता है, तुरंत बिलकुल तुरंत मिलता है लेकिन तुरंत मिलता है ये बात उसी को समझ में आएगी जो समझ सकता हो।
अब फल मिल किसको रहा है? किसको मिल रहा है फल?
जो मूर्ख है उसी को तो फल मिल रहा है न, जो ज्ञानी है वो तो कर्मों का कोई अवशेष छोड़ता नहीं, 'मुझे आगे फल मिले', वो तो अपने कर्म पूर्ण रखता है। तो फल मिल किसको रहा है? जो मूर्ख है। और जो मूर्ख है क्या वो इस बात को समझ पाएगा कि 'मुझे तुरंत फल मिल गया है'? तो इसीलिए फल का एहसास हमेशा भविष्य में होता है, बहुत आगे होता है।


