अनदिनु साहिबु सेवीऐ अंति छडाए सोइ ॥
~ नितनेम (शबद हज़ारे)
आचार्य प्रशांत: “अनदिनु साहिबु सेवीऐ अंति छडाए सोइ”
दो बातें यहाँ पर साफ़-साफ़ समझो। ‘अंत’ से यहाँ पर आशय, समय में अंत नहीं है। हम ‘अंत’ का मतलब समझते हैं – समय में आगे का कोई बिंदु। अंत से अर्थ है – ऊँचाई। अंत से अर्थ है – आख़िरी। अंत से अर्थ है – बड़े-से-बड़ा।
“अंति छडाए सोइ,” में ‘अंति’ का मतलब है, आख़िरी। और आख़िरी समय में नहीं है। आख़िरी मतलब – ऊँचे-से-ऊँची मुक्ति। यहाँ पर अंत वैसे ही है, जैसे – वेदांत। ‘वेदांत’ का अर्थ यह नहीं होता कि वेद ख़त्म हो गए। ‘वेदांत’ का अर्थ होता है – वेदों का शिखर। तो वैसे ही, “अंति छडाए सोइ”, मतलब – ऊँची-से-ऊँची मुक्ति, ‘वो’ देगा। अब प्रश्न उठता है कि, “कौन देगा?” तो उससे पहले कहा जा रहा है, “अनदिनु साहिबु सेवीऐ”। “साहिबु सेवीऐ” से अर्थ है – संसार न सेवीऐ।
‘साहिब’ क्या है? मन जब तक है, तब तक तो वो किसी-न-किसी से तो जाकर चिपकेगा ही। तो संसार से ना चिपके, अतः ‘साहिब’ की ओर जाए। लेकिन आख़िरी कदम पर साहिब भी हट जाते हैं, बस शून्य बचता है। हाँ, शब्दों से तुम्हें खेलना हो, तो कह सकते हो कि, “साहिब ही शून्य है”। फिर ठीक है।
‘साहिब’ शून्य है, ठीक। वो वैसी ही बात है कि – पूर्ण शून्य है, ठीक।


