प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम हर बार कहते रहते हैं कि सब माया है, ये माया है, वो माया है। जैसे मैं यहाँ पर हूँ, तो मैं अभी कैसे अंतर करूँगा कि ये एक साफ़ मन का निर्णय होना चाहिए, और ये एक प्राप्त और अधिकृत मन का निर्णय होना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: जब भी वस्तु रूप में कुछ भी मन पर छाए, वो माया है, उसमें तुम्हें और ज़्यादा सोचने की ज़रुरत नहीं है। मन पर छाना दो तरीके से हो सकता है, आकर्षण, नहीं तो विकर्षण। जब भी कभी कोई वस्तु , और जो भी वस्तु होता है, मानसिक, उसका कोई आकार होता है, नाम होता है। जब भी कोई चीज़, विचार, व्यक्ति, वस्तु, मन पर छाने लगे, सोच का केंद्र बन जाए, तो समझ लेना कि माया है। और कुछ नहीं होती है माया।
मन का रूप की तरफ आकर्षित होना — रूप कुछ भी हो सकता है — या फिर रूप से डरना, वो भी माया ही है। दोनों ही स्थितियों में बात मन पर छाई तो हुई ही है। बात समझ में आ रही है?
कोई इंसान है, तुम्हें बार बार याद आता है, रूप हुआ न वो? एक रूप है। ये माया है। कोई इंसान है, जिसकी याद से तुम मुक्त होना चाहते हो, ये भी माया है। कुछ पाना चाहते हो, माया है। कुछ छोड़ना चाहते हो, माया है। मन में जो कुछ भी है, जब वो बहुत महत्वपूर्ण लगने लगे, तो माया है। हो कुछ भी, कोई भी मानसिक रचना। वो, तुम्हारी नज़रों में ऊँची से ऊँची चीज़ हो सकती है, और छोटी से छोटी चीज़ हो सकती है, पर अगर महत्वपूर्ण लगने लग गयी है, तो माया है। आ रही है बात समझ में?
इसी को कबीर ने ऐसे कहा है कि “जो मन से न उतरे, माया कहिये सोय”। जो भी कुछ मन पर छाया रहे उसी का नाम माया है। और मन पर जो भी छाएगा, उस का रूप, रंग, आकार, सीमा, इतिहास, ये सब होगा ही होगा। मन तो हम जानते ही हैं ना, किसमें रहता है? टाइम एंड स्पेस में। तो मन पर जो कुछ भी छा रहा होगा, वो “कुछ” होगा। और “कुछ” माने? उसकी छवि बनाई जा सकती है। मन में छवियाँ ही तो होती हैं।

