माता-पिता से वास्तव में प्रेम है? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)

प्रश्न: सर, माता-पिता का प्रेम निःस्वार्थ होता है पर उनकी बात हर बार ठीक नहीं लगती। क्या करें?
वक्ता: सवाल इस बात का बिल्कुल भी नहीं है कि हम सहमत होना चाहते हैं या नहीं। है ना? बात करीब-करीब वैज्ञानिक है। जैसे विज्ञान होती है कि उसमें तुम्हारा मत या मेरा मत नहीं चलता, उसमें हम तथ्योँ को देखते हैं कि वास्तव में हो क्या हो रहा है, वास्तव में कितना समय ले रहा है, पेंडुलम, वास्तव में इस रिएक्शन में कितनी ऊर्जा जा रही है, तथ्य क्या हैं, हम तथ्यों को देखना चाहते हैं। है ना?
तो इसी प्रकार जीवन को भी समझना है, रिश्तों को भी समझना है तो तथ्यों को देखना पड़ेगा कि तथ्य क्या इशारा करते हैं। एक बात समझना साफ़-साफ़, हम जो भी करेँगे, उसमें उतनी ही गुणवत्ता होगी जितनी हमारे मन में है। सड़क पर चलते आम आदमी को देखो, अगर तुम पाओ कि वो डरा हुआ है, आशंकित है, दुविधा में है, संशय में है, भविष्य को लेकर चिन्ता में है, आसानी से क्रोधित हो जाता है, तो क्या यही उसके रिश्तों की गुणवत्ता नहीं होगी? एक हिंसक व्यक्ति के रिश्ते क्या प्रेमपूर्ण हो सकते हैं? क्या एक हिंसक मन से प्रेमपूर्ण सम्बन्ध निकल सकते हैं? समझना इस बात को, तथ्यों को देखना चाहते हैं हम।
एक आदमी है जो जीवन में जो भी कुछ करता है, मुनाफ़े के लिये करता है। जो भी कुछ करता है, मुनाफ़े के लिये करता है। उसने विवाह भी किया तो ऐसे किया, ‘सबसे स्वीकार्य लड़की कौन सी मिल रही है। जो मुझे भी ठीक लगे, औरों को भी ठीक लगे। औरों की भी मान्यता मिल जाए, दहेज भी मिल जाए’। मुनाफ़ा देखकर। उसने बच्चे भी कुछ इसी तरीके से पैदा किए। पूरी योजना बनाकर, प्लानिंग के साथ। वो दुकान पर बैठता है, दफ्तर जाता है, वो लगातार मुनाफ़े क़ी कोशिश में है। क्या उसके संबंधों में मुनाफ़ाखोरी नहीं होगी? और तुम देखो चारों तरफ़ अपने समाज़ को। क्या वास्तव में जो कुछ भी हम अपने संबंधों में पाते हैं, चाहे वो माँ-बाप से हो या दोस्त-यार से, क्या वो बेशर्त होता है? क्या उसके पीछे उम्मीद नहीं छुपी होती? और जब वो उम्मीद जब टूटती है तो क्या वो रिश्ता हीं नहीं टूट जाता? ‘तूने अपनी मर्ज़ी से शादी कैसे कर ली? तू आज से मेर बेटा ना रहा। हमने तुझे पाला-पोसा, बड़ा किया ,पैसे खर्च किए’। ध्यान से देखो, ये जो इतनी ऑनर किलिंग्स हो रहीं हैं, वो किस शर्त पर होती हैं? उनके पीछे तर्क बस एक होता है, ‘हमने तुझे पैदा किया, तू हमारी जायदाद है, तू स्वतंत्र निर्णय कैसे ले सकती है, शादी का?’ और तुम कह रहे हो कि हमें जो मिलता है बेशर्त होता है? काश कि ये बेशर्त होता। काश कि ये बेशर्त होता! हज़ार में से एक फूल ऐसा खिलता है जो बेशर्त खुशबू देता है सबको अपनी। काश कि ऐसे फूल और खिलें! हम चाहते हैं कि ऐसा हो, पर दुर्भाग्य ये है कि ऐसा होता दिखता नहीं। बस अपेक्षाएँ दिखती हैं। ‘बेटा हमें तुमसे बड़ी उम्मीदें हैं’ और उम्मीदों के तले बेटे का जीवन बड़ा दबा-दबा सा है, मरा-मरा सा है।

