प्रश्नकर्ता:
नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च।
यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च॥
(अध्याय 3, श्लोक 2)
मैं न तो यह मानता हूँ कि ब्रह्मा को अच्छी तरह जान गया हूँ और न ही समझता हूँ कि उसे जानता हूँ। इसलिए मैं न उसे जानता हूँ, हम में से न तो कोई उसे जानता है इस प्रकार जो जानता है, वही जानता है।
आचार्य प्रशांत: मन इधर को सोंचे चाहे उधर को सोंचे, जो भी सोंचेगा, वो पूरा नहीं होगा। मन दो ही बातें कहेगा: या तो कहेगा कि जानता हूं या ये कहेगा कि नहीं जानता। तुमसे कहा जा रहा है कि दोनों में से जो भी तुमने धारणा रखी, वहीं गलत है। तुम्हारा ये कहना भी गलत है कि जानते हो, ये कहना भी गलत है कि नहीं जानते हो। दोनों ही धारणाएं हैं बस, ये समझ लो।
देखो, मन को कोई विशेष असुविधा नहीं है अगर तुम उससे कहो कि तुम गलत सोंचे रहे हो। ज्यों ही तुम उससे कहोगे कि तुम गलत सोंचे रहे हो, वो कहेगा, "ठीक है। मैं सही सोंचने की कोशिश करता हूं।" लेकिन तुम गलत सोंच रहे हो चाहे सही सोच रहे हो, दोनों में एक बात पक्की है: तुम सोच रहे हो की सोच-सोच कर जाना जा सकता है। पहले गलत सोचा था अब सही। ये मंत्र तुमसे कह रहा है कि तुम क्या सोच रहे हो, ये नहीं गलत है। सोच कर जाना जा सकता है, ये सोच ही गलत है। तुम कुछ भी सोचो, फर्क नहीं पड़ता। गलत सोचो कि सही सोचो, दायां सोचा कि बायां सोचा, ऊपर का सोचा कि नीचे का सोचा, काला सोचा कि गोरा सोचा, सोचा ही तो। सोचने से नहीं होगा क्योंकि सोच कर तुम संसार को जान सकते हो,

