कृष्ण के अलावा कुछ और माँगोगे तो फँस जाओगे || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)

यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रता:। भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।
देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितृों को पूजने वाले पितृों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं। इसीलिए मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ९, श्लोक २५
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ये पितृ, ये भूत, इन सबका क्या अर्थ है?
आचार्य प्रशांत: ‘भूत’ माने भूत (पिशाच) नहीं, ‘भूत’ माने पदार्थ। भूतों को कौन पूजता है?
"देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितृों को पूजने वाले पितृों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं। इसलिए मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता।"
देवताओं को पूजने से क्या आशय है? देवता क्या हैं? आपके ही द्वारा कल्पित एक अति सुंदर छवि। वे सुंदर भी हैं और सामर्थ्यशाली भी हैं। आपके जितने भी देवता हैं, बड़े सबल देवता हैं न — कोई पूरी दुनिया में आग लगा सकता है, कोई पूरी दुनिया को नष्ट कर सकता है, कोई पानी बरसा सकता है, कोई सब जानवरों का नियंता है, कोई व्याधियाँ बरसा सकता है, कोई व्याधियों से मुक्त कर सकता है — तो ये सब देवता लोग हैं।



