प्रश्नकर्ता: सर बात दाएँ-बाएँ इसलिए हो गई क्योंकि आपने हमें एक दर्जे से ऊपर बात कही, पर कुछ समझ नहीं आया। मेरा स्तर इतना नहीं कि उतना तक सोच पाऊँ। मैं सोचने की कोशिश कर रही थी लेकिन समझ नहीं आ रहा था।
आचार्य प्रशांत: तुमको इसलिए समझ में नहीं आ रहा था क्योंकि तुम कोशिश में लगी हुई थी सोचने की। चुपचाप सुनो तो सब समझ में आ जाएगा।
प्र: हम सोचते हैं सच बोलना चाहिए, सच बोलने से अच्छा होता है, पर हम बोलते नहीं है। कैसे पता चले कि अपना जो निर्णय है, वो सही है भी या नहीं?
आचार्य: आप लोग यहाँ बैठे हैं, क्यों बैठे हैं? जा सकते थे, कोई बाध्यता तो थी नहीं रुकने की। कैसे जानें जो अपना निर्णय है, वो अपना है भी या नहीं? सब कर लिया उसके बाद भी गारंटी क्या है? ‘जागो ग्राहक जागो’, एकदम सतर्क ग्राहक हो तुम। कह रही हो, "गारंटी दीजिए तब मानेंगे आपको।" कितना? छह महीने, साल भर? गारंटी क्या है?
(श्रोतागण हँसते हैं)
प्र२: मैं गीता पढ़ रही थी तो मुझे बहुत सारी चीज़ अच्छी लगी लेकिन आपके कक्षा लेने के बाद मुझे लग रहा है क्या वो सही भी है?
आचार्य: बेटा, गीता सही नहीं होती, तुम्हारी दृष्टि सही होती है। एक आतंकवादी अगर गीता को पढ़ेगा तो उसे बहुत पसंद आएगी, कि "अरे! यही तो लिखा है कि मारो! उठा अर्जुन बाण और ठोक। यही तो लिखा है।" जो तुम्हारी दृष्टि होगी, वो तुम्हें दिखाई दे जाएगा। "आत्मा न हन्यते न हंय मने शरीरे, न शोषयति मरुतः। उसका हनन हो ही नहीं सकता—शरीर का हनन हो रहा है—उसका हनन हो नहीं सकता, तो फिर मैं अपराधी भी कहाँ हूँ? मारो, बम पर बम फोड़ो।"


