प्रश्न: सर, अगर हम किसी को कुछ समझा नहीं पा रहे तो इसमें हमारी तरफ से कहाँ चूक है?
वक्ता:न चूक है, न निशाना है; लीला है । उसमें चूकने का कोई सवाल नहीं है । तुम्हें नहीं पता कि तुम चूक-चूक कर कहाँ पहुँचे जा रहे हो । मन सीमित होता है और उसकी दृष्टि भी सीमित होती है । जिसको तुम अपनी असफलता कहते हो वो अस्तित्व के अनंत कैनवास पर क्या है ये तुम जान नहीं पाओगे । ऐसे तो कहते फिरते हो हमेशा वो कैटरपिलर-बटरफ्लाई वाली बात कि जो एक के लिए मौत है, दूसरे के लिए जीवन है । जिसको तुम अपनी चूक कहते हो वो चूक सिर्फ आज के सीमित संदर्म में है । और बड़े संदर्म में वो क्या है, तुम नहीं जानोगे ।
वो कहानी सुनी ही है ना- एक बूढ़ा आदमी था, गाँव में रहता था । एक दिन पाता है कि उसके घर के सामने एक घोड़ा आकर खड़ा हो गया । गाँव वालों ने कहा, “बधाई हो, बधाई हो, बहुत बढ़िया घटना घट गयी” । उसने कहा- “ठहरो, इतनी जल्दी निर्णय मत लो । हम नहीं जानते कि क्या घट रहा है । आज के सीमित संदर्म में देखोगे तो लगेगा कि बहुत बढ़िया घटना घट रही है पर जैसे-जैसे तुम अपनी दृष्टि को व्यापक करते जाओगे तो पता चलेगा कि कुछ और ही हो रहा है” ।
पर गाँव वाले तो बड़े खुश कि बहुत सुन्दर-सफ़ेद घोड़ा इस आदमी को मिल गया है । कुछ दिनों तक ऐसा ही चला और एक दिन वो सफ़ेद घोड़ा खो गया । गाँव वाले आये उसके पास और बोले, “बड़ा बुरा हुआ, बड़ा बुरा हुआ” ।
व्यक्ति ने फिर कहा, “ठहरो, आज की नज़र से देख रहे हो तो लग रहा है बड़ा बुरा हो गया । तुम नहीं जानते बात कहाँ तक जायेगी” । घोड़ा दोबारा जंगल चला गया था, वहाँ से अपने चार-पाँच साथी लेकर आ गया । कुछ दिनों बाद देखा जाता है तो उसके सामने एक नहीं, पाँच घोड़े खड़े हुए थे ।

