आचार्य प्रशांत: मुझे बड़ी ख़ुशी होती इस सवाल का कोई सकरात्मक जवाब देकर। सवाल तुमने इस तरीके से पूछा है कि लगता है, “लक्ष्य ‘मेरे’ हैं और दुनिया उनमें बाधा डाल रही है। तो मैं क्या करूँ?” लेकिन बात थोड़ी-सी इससे अलग है। बात असल में यह है कि वो लक्ष्य भी तुम्हारे नहीं हैं, वो लक्ष्य भी दुनिया ने ही दिए हैं, इसी कारण दुनिया उनमें बाधा डाल पा रही है।
जो लक्ष्य पूर्णतया तुम्हारा होता है, दुनिया उसमें कभी बाधा डाल ही नहीं सकती।
दुनिया तुम्हारे लक्ष्यों में बाधा डाल देती है न? तुम लक्ष्य बनाते हो तो लक्ष्य बदल भी जाते हैं। उसका कारण यह है कि वो जो लक्ष्य हैं, वो तुम्हारे हैं ही नहीं, वो भी तुम्हें दुनिया ने ही दिए हैं। तुम उन्हें बस अपना मान कर बैठ गए हो कि ‘मेरे’ लक्ष्य हैं। पर वो मूलतः तुम्हारे लक्ष्य हैं ही नहीं, वो दुनिया ने ही तुम्हें दे दिए हैं और तुमने धोख़े से उन्हें अपना मान लिया है।
इस पर ग़ौर करना ईमानदारी से – जब दुनिया के दिए हुए लक्ष्यों को हटा दोगे तब शायद कुछ ऐसा मिलेगा, ऐसा बचेगा जो पूर्णतया तुम्हारा है। फिर उसमें दुनिया कोई दख़ल नहीं डाल सकती।
अभी तो तुम देखो न तुम किन बातों को अपना लक्ष्य मान कर बैठे रहते हो। तुम कहते हो कि, “मुझे अंक ज़्यादा लेकर आने हैं।” यही कहते हो न कि, "अंक ज़्यादा लाने हैं, यह मेरा लक्ष्य है"? अभी परिणाम निकले थे, तो सब घूम रहे थे। कुछ लोग निरुत्तीर्ण हुए तो उदास घूम रहे थे, महीने भर पहले की बात है। तो मैंने पूछा कि उदासी का कारण क्या है? जवाब मिला कि परिणाम खराब आ गया है, अंक अच्छे नहीं आए हैं।

