प्रश्न: सर, अपना लक्ष्य निर्धारित करते हैं भविष्य के लिये। तो वो कैसे करते हैं?
वक्ता : कल्पना कर कर के।
श्रोता : कल्पना तो कुछ नहीं है।
वक्ता : कुछ नहीं है? तो लक्ष्य भी कुछ नहीं है। अगर तुमने ये देख ही लिया है कि वो जो लक्ष्य है जिसको निर्धारित करते हो, चाहे वो सिविल सर्विसिस का हो, चाहे वो प्लेसमेंट का हो, चाहे कुछ और हो। चाहे इतना सा ही लक्ष्य हो कि आज यहाँ से वापिस जा कर के कुछ कर डालना है। ये सारी कल्पनाएँ हैं। ये सब कल्पनाएँ हैं लेकिन तुम्हारी ऐसी आदत हो गई है कल्पनाओं में जीने की कि जब ये कहा जाता है कि ये सब मात्र कल्पनाएँ हैं, तुमको बड़ा झटका लग जाता है।
श्रोता : पर ज़्यादातर बातें कल्पनाओं में ही होती हैं। कहीं भी जाते हैं इंटरव्यू के लिए तो वो यही पूछेंगे ना कि आपका लक्ष्य क्या है ?
वक्ता : पर क्या तुम उस वक़्त ये समझ रहे होते हो कि ये काल्पनिक बात है? इंटरव्यूअर जब तुमसे पूछ रहा होता है कि तुम्हारा लक्ष्य क्या है तो क्या उस समय तुम समझ रहे होते हो कि ये जो बात पूछ रहा है, ये बड़ी काल्पनिक सी बात है। अगर तुम उस वक़्त ये समझ जाओ तो तुमको बहुत मज़े आएँगे। तुम्हें हल्की सी मुस्कान आ जाएगी, तुम्हारा मन हल्का रहेगा और तुम सहज भाव से उत्तर दे पाओगे पर, उस वक़्त तो तुम ये सब कुछ नहीं समझ रहे हो न कि ये सब काल्पनिक बात है। उस समय तो तुम्हें लग रहा होता है कि ये दुनिया की सबसे खास बात है। उस वक़्त तुम्हें लग रहा होता है कि इससे ज़्यादा संजीदा मुद्दा और कुछ हो ही नहीं सकता। फ़िर क्या होता है? फ़िर तुम्हारे पसीने छूटते हैं, फ़िर तुम्हारे पाँव काँपते हैं, फ़िर तुम्हारा दिल धड़कता है। तुम ये जान ही जाओ अगर, कि ये सब जो चल रहा है इंटरव्यू में, ये सब खेल बस है, नकली है, काल्पनिक है तो तुम तो बिलकुल बादशाह हो जाओगे न फिर। पर जान कहाँ पाओगे? पर जानना उसी वक़्त होता है, बाद में नहीं।


