ज्ञान न अज्ञान, न सुख न दुःख || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता पर (2014)

न विक्षेपो न चैकाग्रयं नातिबोधो नमूढता।
न सुखं न च वा दुःखं उपशान्तस्य योगिनः।।
~ अष्टावक्र गीता, श्लोक १०, अध्याय १८
(अर्थ: अपने स्वरुप में स्थित होकर शांत हुए तत्वज्ञानी के लिए न विक्षेप है और न एकाग्रता, न ज्ञान है और न अज्ञान, न सुख है और न दुःख)
आचार्य प्रशांत: तीन प्रकार के द्वैत हैं जिनकी बात कर रहे हैं अष्टावक्र:
समझने वाले के लिए समस्त द्वैत मिट जाते हैं, इस अर्थ में मिट जाते हैं कि वो समस्त द्वैतों के मूल में स्थापित हो जाता है। द्वैत का अर्थ ही है: अलग-अलग। उस समझने वाले को अष्टावक्र ‘योगी’ कह रहे हैं, उसने द्वैत के दोनों सिरों के संधि स्थल पर, जहाँ उनका योग होता है वहाँ अपना आसन जमा लिया है, अब उसके लिए विक्षेप और एकाग्रता अलग-अलग नहीं हैं। न उसके लिए मन की एकाग्रता है, कि जहाँ जाकर के बैठने के लिए मन उत्सुक हो, न उसके लिए कुछ ऐसा है कि जहाँ से मन भागना चाहे — न विक्षेप न एकाग्रता।




