प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बहुत दिनों से आपको सुन रहा हूँ। आपके बताए गए उपाय भी मालूम हैं, पर फिर भी मन सत्य से दूर भागता है, गुरु से मुँह चुराता है। कोई उपाय बताएँ कि सत्य और गुरु से प्यार हो जाए।
आचार्य प्रशांत: ये वो लोग हैं जो प्यार भी उपाय से करते हैं, चालाकी से। प्यार क्या है? अरेंज्ड मैरिज (पूर्व-नियोजित विवाह) है कि उपाय से करी जाएगी? उपाय माने तो धोखा होता है, युक्ति, चालाकी। तुम्हें प्यार भी चालाकी से करना है? कहाँ हो! इनको चालाकी से प्यार चाहिए, कि, "कोई तरीका लगाइए कि हमें प्यार हो जाए।"
जिसका प्यार तरीके से पैदा हो सकता है, कोई दूसरा तरीका लगाया जाएगा तो वो प्यार ख़त्म भी हो जाएगा। प्यार अकारण होता है, तरीकों से नहीं होता। और ये जितनी बातें लिख रहे हो, झूठ हैं, खुला झूठ बोल रहे हैं आप। "आपके बताए गए उपाय भी मालूम हैं, काफ़ी दिनों से आपको सुन रहा हूँ।" आज तक सुना है?
हम कह रहे थे न धर्म और अज्ञान का बड़ा सम्बन्ध है, ये देखो ज्ञाता, "आपके बताए गए उपाय मालूम हैं।” मैं आज तक किसी को कोई उपाय बताता हूँ? और इनको मेरे बताए गए उपाय मालूम हैं।
सत्य निरुपायता में होता है। जब बिलकुल निरुपाय हो जाओ, बिलकुल असहाय हो जाओ, तब सत्य उतरता है।
और इनको उपाय मालूम हैं, और वो भी जो मैंने बताए ही नहीं। ऊपर लिख दोगे, "आचार्य जी, प्रणाम", इतने भर से आचार्य जी ख़ुश हो जाएँगे और उसके बाद खुला झूठ बोलोगे!

