प्रश्न: आचार्य जी, प्रणाम। जब कभी-कभी मुझे लगता है कि कोई ग़लत कर रहा है या बोल रहा है, तो मैं उन्हें रोक नहीं पाती। ऐसा लगता है कि बोलूँगी तो उन्हें बुरा लगेगा, या उनको तक़लीफ़ होगी। उनकी बात पर बस हँस कर चली आती हूँ।
क्या ऐसा करना ठीक है?
आचार्य प्रशांत जी: न ठीक है, न ग़लत है। ये तुम वही कर रही हो, जो तुम अपने साथ चाहती हो होना।
तुम्हें नहीं पसंद है कि तुम कुछ कर रही हो तो तुम्हें टोका जाए, तुम्हें नहीं पसंद है कि तुम्हारी कोई खोट निकाले। क्योंकि तुम्हें नहीं पसंद है कि तुम्हारी खोट निकाली जाए, तो तुम्हें डर लगता है कि जब तुम दूसरों की खोट निकालोगी, तो उन्हें बुरा लगेगा।
बात को समझना।
जिस चीज़ को तुम अपने में मूल्य देते हो, उसी चीज़ को तो तुम दूसरे में मूल्य दोगे न।
जिसको अपनी ठसक प्यारी होगी कि – “कोई हममें दोष न निकाले”, उसको ही डर भी लगेगा कि हमने दूसरों में दोष निकाला तो उन्हें बुरा लग जाएगा।



