प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, दुनिया में इतने कम कबीर क्यों हुए हैं? मेरे परिवारजन मुझे इसी बात का उदाहरण देकर आध्यात्मिक मार्ग से विचलित करते हैं और खुद को भी दुनिया की ओर आकर्षित पाता हूँ, कृपया स्पष्ट करें।
आचार्य प्रशांत: करोड़ों कबीर हो जाते, पर हर कबीर के पास वैसा ही घर था और वैसे ही रिश्तेदार,और वैसे ही शुभ-चिंतक और हितैषी जैसे आप के पास हैं, तो हो ही न पाए!
कबीर, कबीर कैसे हो? यदि कबीर को बता दिया जाए कि कबीर एक असंभावना है, हो ही नहीं सकते, हजारों जन्म लग जाते हैं, कबीर तो वो जिन्होंने कहा कि ‘बात की बात में राम हाजिर’, अभी-के-अभी!
जिसको अभी यकीन है कि सत्य बहुत दूर है, उसने तो यकीन करके सत्य को दूर बना दिया।
सच्चाई या जिसको भी आप मुक्ति, मोक्ष या परमात्मा कह रहे हैं, वो तो अपनी ओर से कोई दूरी बनाने में उत्सुक है नहीं, गौर करो, ध्यान से देखो, सहज़ जियो, सब सामने है, कोई बड़ी बात है ही नहीं। हाँ, तुम यह बैठा ही लो मन में कि ‘बहुत बड़ी बात है, हिमालय चढ़ जाना है, न जाने कितने जन्म लगेंगे’,
जितने जन्म चाहो उतने जन्म लग जायेंगे!
कुछ दूर नहीं है, कुछ मुश्किल नहीं है, सहज को मुश्किल कह-कह के हम इसे मुश्किल बनाए दे रहे हैं!


