दूसरों पर निर्भर गृहस्थ महिला कैसे बढ़े मुक्ति की ओर? || आचार्य प्रशांत, संत लल्लेश्वरी पर (2019)

प्रश्न: आचार्य जी, लाल देद कह रही हैं, "देखते हुए अनदेखा करो; जानते हुए से अंजान बनो; और सुनते हुए को अनसुना करो," वैसे ही मैं एक गृहणी होते हुए किस तरीके से अपने अध्यात्म की ओर बढ़ रहे सभी क़दमों को अनदेखा कर सकती हूँ? क्या उनको अनदेखा करना ही मेरे लिए सही रास्ता है?
आचार्य प्रशांत: देखने के तरीक़े होते हैं; अनदेखा करने के लिए तो आँख बंद करनी होती है। कोई पूछे कि - "कैसे देखें?” तो मैं कहूँ कि फलानी जगह पर जाकर देखो। आप पूछें कि - "कुतुब मीनार कैसे देखें?” तो मैं क्या कहूँगा? मैं तरीक़ा बताऊँगा। मैं कहूँगा कि - "सुबह-सुबह ऐसे गाड़ी करिए, फिर वहाँ जाइए, फिर इतने बजे खुलता है, फिर टिकट लीजिए, फिर खड़े हो जाइए तो कुतुब मीनार दिखाई देगी।” आप मुझसे पूछिए कि - "कुतुब मीनार कैसे ना देखें?” तो मैं कहूँगा - "मुझे माफ करिए *(हँसते हुए)*।" अनदेखा करने की क्या विधि बताऊँ? आप पहले बताइए कि 'देखने' की मजबूरी क्या है?
आप कह रही हैं कि आप गृहणी हैं, आपका अध्यात्म की ओर झुकाव है, और घरवालों की ओर से विरोध इत्यादि है, तो आप कह रही हैं कि उनके विरोध को अनदेखा कैसे करूँ। अनदेखा ही है, करने दीजिए विरोध। उस विरोध का संज्ञान लेना ज़रूरी क्यों है? क्यों है ज़रूरी? क्यों है? अच्छा, जैसे बैठी हैं ऐसे ही बैठे रहिए। आपके पीछे (सत्र में) जो व्यक्ति हैं, उनके मूँछें हैं कि नहीं? जल्दी बताइए!
(प्रश्नकर्ता मुस्कुराती हैं)
मूँछ का मुस्कुराहट से कोई ख़ास संबंध नहीं है, बताना होगा।
प्रश्नकर्ता: देखना पड़ेगा।


