प्रश्नकर्ता: आचार्य जी आपका पॉलीगैमी (बहु-विवाह) के बारे में क्या कहना है? जैसे एक परिवार है उसमें पत्नि या पति है, तो अगर पति की दो-तीन प्रेमिकाएँ हों तो पत्नी को अच्छा नहीं लगता है। तो क्या ये भी नहीं होना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: बेटा, अगर मॉनोगामी (एक-विवाह) है तो पॉलिगामी होगी। अगर मॉनोगामी है तो प्रोस्टिट्यूशन (वेश्यावृत्ति) भी होगा। ऐसा नहीं है कि दो-चार स्त्रियों के पास जाकर या दो-चार पुरुषों के पास जाकर कोई शांति मिल जाने वाली है। बेचैनी तुम्हारी, तुम एक औरत के साथ रहो, पाँच औरतों के साथ रहो, बराबर की रहेगी। लेकिन तुम यदि एक औरत के साथ बँधे ही इसलिए थे क्योंकि तुम बेचैन थे, तो तुम्हारी वो बेचैनी एक औरत से तो मिटेगी नहीं, तो तुम पाँच के पास भागोगे ही। समझो बात को! अधिकांश लोग शादी करते ही क्यों हैं? अधूरापन लगता है और जैसे कमलेश (एक स्वयंसेवक) बोल रहा था - सब ने कर ली है मैं ही रह गया हूँ, और घरवाले सता रहे हैं, किराए पर फ्लैट भी नहीं मिलता; यही सब बहुत बड़ी बातें हो जाती हैं, भाई! इनके मारे लोग शादी कर लेते हैं। "और मेरे पीछे तीन और हैं घर में, पहले मेरी होगी तब न उनकी होगी। वो जो पीछे वाले हैं वो चिकोटि काटते हैं। कहते हैं – भैया! तुम रास्ता रोके खड़े हो।" ऐसी-ऐसी बातें! इन बातों पर शादियाँ हो जाती हैं, तो इन बातों पर तुमने शादी कर ली। अब उस शादी में कोई प्रेम तो मिलेगा नहीं क्योंकि जो मूल कारण ही था विवाह का वो कारण ही भ्रष्ट था।
जो तुम उस स्त्री में खोजने गए थे वहाँ तुम वो पाओगे ही नहीं। जब वहाँ नहीं पाओगे तो ज़ाहिर सी बात है कि चार जगह और भागोगे। हो सकता है चार औरतों के पास ना जाओ तो पॉर्न देखोगे। वो भी तो यही है कि उसको अगर हाड़-माँस से नहीं छू सकते तो कंप्यूटर की, मोबाइल की स्क्रीन पर उसको छू लें। ये सब तुम क्यों करोगे? क्योंकि तुम बेचैन हो, व्यथित हो। और मज़े की बात ये कि पाँच के पास जाकर के भी तुम रहोगे खाली के खाली ही, मिल कुछ नहीं जाएगा। लेकिन ये पक्का है कि जाओगे ज़रूर, ये रुक नहीं सकता। जब तक इंसान को आत्मिक अतृप्ति है, वो भटकेगा ही इधर-उधर भूत की तरह; भटकेगा और पाएगा कुछ नहीं। हाँ लफड़े ज़रूर हो जाएँगे। अब उनको सुलझाओ।


